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अमराई की छाँव

अमराई की छाँव अमराई की छाँव तले, मन अपना ठहर जाता था , सूखे मन का हर कोना, सावन सा भर जाता था । पत्तों से छनकर धूप जब, माथे को सहलाती थी , माँ की कोमल उँगली जैसे, चुपके प्यार जताती थी । कोयल की मीठी तानों में, यादों का गाँव बसा करता था … Read more