अमराई की छाँव
अमराई की छाँव तले, मन अपना ठहर जाता था ,
सूखे मन का हर कोना, सावन सा भर जाता था ।
पत्तों से छनकर धूप जब, माथे को सहलाती थी ,
माँ की कोमल उँगली जैसे, चुपके प्यार जताती थी ।
कोयल की मीठी तानों में, यादों का गाँव बसा करता था ,
हर डाली पर बीता बचपन, हँसता और महकता था ।
कच्चे आमों की खुशबू में, दादी- नानी का स्नेह मिला करता था,
रोटी, अचार, गुरम्मे में ममता का, खट्टा मीठा एहसास हुआ करता था।
थकी हुई इस भागदौड़ में, अब जब मन घबराता है,
अमराई की छाँव तले ही, खुद को फिर पाता है।
झूले की धीमी पींगों संग, सपनों को यूँ उड़ जाना,
बिन बोले ही पेड़ों से, हर मन की बातें कर आना।
कितने रिश्ते, कितनी यादें, इन डालों ने सँजोई हैं,
किसी की हँसी, किसी के आँसू, चुपके-चुपके सब ढोई हैं ।
अमराई केवल पेड़ों का, न केवल सुंदर एक ठिकाना है,
ये तो गाँव की धड़कन है, ये न कोई बीता ज़माना है ।
जब भी जीवन धूप बने और साँसें बोझिल सी होती हैं,
अमराई की छाँव कुछ लगे, जैसे कितना अपनापन है।
स्वरचित ✍🏼
स्वीटी श्रीवास्तव
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