Abhi is lekh ko 84 log padh rahe hain

मुझे “मैं” पुकारा करे है।

खुली आँख रातें गुज़ारा करे है, सुबह तक अँधेरा निहारा करे है। रगों में मोहब्बत लहू-सी बसी है, न दुश्मन, न ख़ुद से भी हारा करे है। नमी आँख की अब उसे भा रही है, भले दर्द दिल के उभारा करे है। यही सोच लेकर चला वो अभी तक, बिगाड़े वही जो सुधारा करे है। … Read more