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परछाईयाँ

परछाईयाँ धूप की गोद में पलती परछाईयाँ शाम हर रोज़ ही ढलती परछाईयाँ ना दिखे दौड़ती यायावर बन चुकीं रोशनी को पकड़ चलती परछाईयाँ दीपकों के तले हैं उपेक्षित बहुत देखती हूँ मैं अब जलती परछाईयाँ जब लपेटे प्रभा बढ़ती धागों सी ये रील जैसे बढ़े छलती परछाईयाँ बन पसीना ये जब बूंदों में बह … Read more