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गज़ल होकर

गज़ल होकर टेड़े मेड़े, लंबे रास्तों से होकर, गुजरना पड़ता है, दिलों को छूकर, मन की ज़मीन के गहरे निशानों में, सुकून पाती हैं सांसें , एहसास बोकर, आंखों की उदासी में हों, मौसम नमी का, उग आते हैं जज़्बात गज़ल होकर, यूं चमक उठते हैं काव्य में अक्षर, खदानों से निकले हों हीरे धोकर, … Read more

हे दुर्गे माँ

हे दुर्गे माँ हे दुर्गे माँ शेर वाहिनी क्युं युद्धों से धरती ये जल रही है मासूम प्राणी ड़रे हुए हैं क्यूं उनकी धड़कन दहल रहीं है हे दुर्गा माँ कब थमेगी नफरत क्यूं हिंसा हर देश पल रही है हैं सांसें अपनी खुदी की धड़कन क्यूँ प्यारे लम्हे यूँ छल रही है हे दुर्गा … Read more

परछाईयाँ

परछाईयाँ धूप की गोद में पलती परछाईयाँ शाम हर रोज़ ही ढलती परछाईयाँ ना दिखे दौड़ती यायावर बन चुकीं रोशनी को पकड़ चलती परछाईयाँ दीपकों के तले हैं उपेक्षित बहुत देखती हूँ मैं अब जलती परछाईयाँ जब लपेटे प्रभा बढ़ती धागों सी ये रील जैसे बढ़े छलती परछाईयाँ बन पसीना ये जब बूंदों में बह … Read more

अंधेरों की परवरिश

अंधेरों की परवरिश क्या ये अंधेरों की परवरिश है जो चाँद इतना चमक रहा है कोई तो रिश्ता है रोशनी से अंधेरा सदियों से संग खड़ा है जो एक दिन छू लिया था तुमने वो पतझड़ों में शज़र हरा है हम अपनी धड़कन से थक गये है सांसें छोटी या दिन बड़ा है उदासियां क्यूँ … Read more