“ग़ज़ल रेखा की”

— ग़ज़ल रेखा की —

उम्र भर का दर्द दिल में बंद है,

होठों से कहते नहीं पर अंदर

दिल में काँटे गड़ रहे हैं।

आँसुओं की धार बहकर रुक जाए,

शायद दिल को कुछ सुकून मिलता है,

दर्द की गहराई को सहते-सहते

हमने शब्दों में पिरो रखा है।

इस ज़िंदगी का गम सहते-सहते,

हमने अपने दर्द को छिपाया,

हँसी और खुशी को छीनकर

चिराग अँधेरे का बुझा आए हैं।

उम्मीदों के दिए बुझ न जाएँ,

हम तो हर मोड़ पर हार जाते हैं,

ग़म की इस खामोशी के पीछे

कई राज़ दफ़न हो जाते हैं।

इसलिए शब्दों को सहारा बनाया,

हर बात को ग़ज़ल में सजाया…

— लेखिका रेखा तोमर मैहर

Leave a Comment