विश्वासघात क्यों?

जब हम किसी की मदद करते हैं, तो बदले में कम से कम ईमानदारी की उम्मीद तो करते ही हैं। लेकिन जब मदद के बदले ‘अपनों से विश्वासघात’ मिलता है, तो इंसान अंदर तक टूट जाता है। आइए पढ़ते हैं डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’ जी की एक ऐसी ही मार्मिक कहानी।

स्कूल का वो दिन और मदद की गुहार

“मैम, शीनू मैम आपको बुला रही हैं।” एक बच्चे ने कक्षा में आकर कहा।

“ठीक है, मैं आ रही हूँ।” प्रभा ने बच्चों को गणित के सवाल दिए और जब वे शीनू मैम के पास पहुँची, तो वे उस समय कोई फॉर्म भर रही थीं।

“अरे प्रभा, आओ, आओ। तुमसे कुछ बहुत ही जरूरी काम था।”

“जी, क्या काम है? बताइए।” प्रभा ने पूछा।

झूठे आँसू और भावनाओं में फँसाना

शीनू मैम ने कहा, “तुम रितेश की श्योरिटी (Surety) कर दो। मैं भी कर रही हूँ और अपने नाम पर कुछ लोन लेकर उसे दे दो। यहाँ पर कुछ और भी शिक्षक दे रहे हैं। वह इस समय बहुत ही ज़्यादा कर्ज में दब चुका है। साथ का शिक्षक है, उसकी मदद तो करनी ही चाहिए।” शीनू मैम रितेश की तरफ से उसे पूरा भरोसा भी दे रही थीं।

उसी समय रितेश भी वहाँ आ गया और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा, “दीदी, आप मेरी बड़ी बहन जैसी हो। मैं आपका एक-एक पैसा लौटा दूँगा। मैं इस समय बहुत ही परेशान हूँ।” उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उन आँसुओं ने प्रभा को भावुक कर दिया।

प्रभा ने कहा, “ठीक है, मैं घर में बात करके बताऊँगी।”

पति की सहमति और एक बड़ी भूल

छुट्टी के बाद जब प्रभा घर पहुँची, तो पता चला कि रितेश पहले से ही वहाँ आकर उसके पति के पैर पकड़कर मिन्नतें कर चुका है। उसके पति भी उसकी बात मान चुके थे।

अगर उसने पैसे नहीं लौटाए तो क्या होगा? प्रभा ने अपनी चिंता जाहिर की।

उसके पति ने कहा, “अरे नहीं, वह सीधा-सीधा बंदा है, वह पैसे लौटा देगा, हड़पेगा नहीं। बेचारा बहुत अधिक कर्ज में डूब गया है।”

दोनों ने मिलकर श्योरिटी भी दी और अपने-अपने नाम पर लोन लेकर उसे पैसे भी दिए। उन्होंने केवल इसी उम्मीद पर यह सब किया कि आज इसका भला होना चाहिए, कल की कल देखी जाएगी।

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अपनों से विश्वासघात और कर्ज का बोझ

धीरे-धीरे समय बीतता रहा, पर रितेश ने पैसे लौटाने का नाम तक नहीं लिया। इधर प्रभा और उसके पति दोनों बुरी तरह फँस चुके थे।

उन्होंने अपने लिए भी लोन ले रखा था और रितेश के लिए लिए गए लोन के कारण उनका बजट बिल्कुल ही असंतुलित हो गया। कभी इस सोसायटी का पैसा बाकी रह जाता, तो कभी दूसरी सोसायटी का। हर महीने डिफाल्टर (Defaulter) का नोटिस आता रहता।

फोन न उठाना और धोखे का असली चेहरा

इन सबके बावजूद रितेश ने उन लोगों का पैसा नहीं लौटाया। धीरे-धीरे कई साल गुजर गए, पर उसकी नीयत में खोट आ चुका था।

फोन करने पर वह फोन नहीं उठाता था और घर जाने पर कहला देता कि वह घर पर नहीं है। स्कूल जाने पर एक तो मिलता नहीं और मिलता भी तो वह बस एक ही लाइन बोलता— “लौटा दूँगा।” पर पैसे लौटाने का नाम ही नहीं लिया।

निष्कर्ष: टूटे हुए भरोसे का दर्द

धीरे-धीरे कई साल बीत गए, पर उस इंसान ने कर्ज नहीं लौटाया। इस अपनों से विश्वासघात ने प्रभा को अंदर तक तोड़ दिया था।

उसे अब यही लगता है कि अगर इस दुनिया में मदद करने का यही खामियाजा भुगतना पड़ता है, तब कभी भी किसी की मदद नहीं करनी चाहिए। किसी पर भी आँख मूँदकर विश्वास करना इंसान की सबसे बड़ी गलती साबित हो सकती है।

©️ लेखिका: डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा’ स्थान: दिल्ली

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