मिट्टी से आएं बप्पा, मिट्टी में लौटें…

मिट्टी से आएं बप्पा, मिट्टी में लौटें…
-प्रभात दत्त झा

मिट्टी से आएं बप्पा, मिट्टी में लौटें…

इस गणेश उत्सव पर, जब हम आस्था और उल्लास से भर जाते हैं, तो एक मिट्टी की गणेश मूर्ति घर लाना पर्यावरण और धर्म दोनों का सच्चा सम्मान है। गणपति बप्पा मोरया की धुन जब बिलासपुर की गली में उठती है, तो आँगन में चावल-हल्दी बिखरते हैं और बच्चे मूर्ति के गज पर उंगली फेरते हैं। एक दिन वाले घर भी हैं, तीन दिन वाले भी, दस दिन तक पंडाल जगाने वाले भी। विसर्जन के दिन ढोल आगे होता है, परिवार पीछे। घाट पर पानी छूते ही कई चेहरे उसी रंग-रोगन के साथ किनारे लौट आते हैं। बाहर उत्सव पूरा लगता है। पानी के अंदर काम बाकी रह जाता है।

सवाल आस्था का नहीं, खरीदारी का है। यदि आप मिट्टी की गणेश मूर्ति की जगह प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) से बने और रासायनिक रंगों से सजे भगवान की प्रतिमा लाते हैं, तो विसर्जन के बाद वही जल—जिससे हम सिंचाई, मछली और कभी स्नान जोड़ते हैं—बुरी तरह प्रभावित होता है। क्या हर परिवार को यह संकल्प लेना चाहिए कि बप्पा प्लास्टर से न बनें? बिलासपुर का पाठक इस प्रश्न को अरपा किनारे, तालाब घाट पर और बाजार की दुकान पर खुद देख सकता है।

मिट्टी की गणेश मूर्ति और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियम

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मई 2020 की संशोधित मूर्ति विसर्जन दिशानिर्देशों में प्राकृतिक, जैव-निम्नीकरणीय सामग्री और प्राकृतिक रंगों पर भारी जोर है। प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों के निषेध का स्पष्ट उल्लेख इन्हीं दिशानिर्देशों में है। कई राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड हर वर्ष दोहराते हैं— मिट्टी की गणेश मूर्ति अपनाएँ, प्लास्टिक-थर्मोकोल हटाएँ, मूर्ति छोटी रखें, मीठे पानी के स्रोत में विसर्जन न करें, फूल-वस्त्र पहले उतारें।

केरल जैसे राज्यों में विसर्जन के अगले दिन समुद्र तट पर अखंड मूर्तियाँ फिर दिखीं। कर्नाटक के कुछ जिलों में निर्माण-बिक्री पर स्थानीय रोक की खबरें आईं। तमिलनाडु ने हरित अधिकरण के समक्ष जल निकायों में विसर्जन पर चरणबद्ध रोक का बयान दिया। नियम राज्य-दर-राज्य अलग हैं, लेकिन एक बात साझा है: सामग्री बदलने का दबाव बढ़ रहा है। आप जल प्रदूषण के गंभीर प्रभावों के बारे में विकिपीडिया पर विस्तार से पढ़ सकते हैं।

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प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) बनाम मिट्टी की गणेश मूर्ति

प्लास्टर ऑफ पेरिस जिप्सम से बना कैल्शियम सल्फेट है। यह हल्का और साँचे में तेज है, इसलिए बाजार ने इसे अपनाया। वहीं दूसरी ओर, प्राकृतिक मिट्टी की गणेश मूर्ति पानी में आसानी से बिखरती और घुलती है। प्लास्टर देर तक अपना रूप रखता है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की पुरानी प्रयोगशाला तुलना में शादू (प्राकृतिक) और मिश्रित मिट्टी जल्दी टूटी, जबकि प्लास्टर कई दिनों बाद भी नदी के तल में बैठा रहा।

घुलने पर कठोरता और सल्फेट बढ़ने के संकेत कई अध्ययनों में आए हैं। यदि पेंट में सीसा, कैडमियम या पारा हो, तो तलछट और जलीय जीवों तक पहुँचने की गंभीर आशंका दर्ज है। भारतीय मानक ब्यूरो पेयजल में इन धातुओं की सीमा बहुत नीची रखता है। बिलासपुर की अरपा या स्थानीय तालाबों का ताजा प्रयोगशाला आँकड़ा इस आलेख में नहीं जोड़ा गया है, लेकिन सामान्यीकरण से बचने के लिए यही वैज्ञानिक सीमा समझना जरूरी है।

छत्तीसगढ़ में बढ़ रही है मिट्टी की गणेश मूर्ति की मांग

छत्तीसगढ़ में संकेत बदल रहे हैं। अंबिकापुर में इस गणेशोत्सव मिट्टी की गणेश मूर्ति की मांग काफी बढ़ी और दर्जनों स्थानों पर कारीगर शुद्ध मिट्टी से काम करते दिखे। दुर्ग-भिलाई समेत कुछ जिलों के प्रशासनिक निर्देशों में प्लास्टर, प्लास्टिक और थर्मोकोल पर अंकुश तथा निर्धारित मार्ग-स्थल पर विसर्जन अनिवार्य कहा गया है।

घरों में छोटे गणेश मिट्टी से बनाने की सलाह अब एक सामान्य चर्चा है। यह बदलाव केवल एक नारा नहीं, बल्कि दुकान और समझदार ग्राहकों की पसंद बनता जा रहा है। पर्यावरण के अनुकूल उत्सव मनाने के और तरीकों के लिए आप हमारे त्योहारों में पर्यावरण संरक्षण के उपाय लेख को पढ़ सकते हैं।

मूर्तिकार का संघर्ष और पर्यावरण की सेहत

दूसरी ओर मूर्तिकार का समय और मजदूरी है। प्लास्टर जल्दी तैयार होता है, दस दिन टिकता है और ज्यादा चमक देता है। बड़े पंडाल ऊँचाई और आकर्षण चाहते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि नुकसान मुख्यतः जहरीले पेंट और सजावट के गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरे से होता है, केवल जिप्सम से नहीं। कुछ का तर्क है कि बहुत अधिक मिट्टी भी नदी तल पर बैठकर उसके प्राकृतिक छिद्र भर सकती है।

इसलिए पूरा दोष केवल एक सामग्री या एक समुदाय पर रखना गलत होगा। सही प्रश्न यह है—क्या घर की मूर्ति के लिए सस्ता रासायनिक चमक जरूरी है, या हमारी नदियों और पानी की सेहत भी हमारी पूजा का ही एक अभिन्न हिस्सा है? एक शुद्ध मिट्टी की गणेश मूर्ति इस वैचारिक द्वंद्व का सबसे सरल और पवित्र समाधान है।

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विसर्जन का व्यावहारिक रास्ता: मिट्टी से आएं बप्पा

इस समस्या का व्यावहारिक रास्ता तीन सरल कदम का है:

  1. घर की मूर्ति केवल मिट्टी की हो, और रंग हल्दी-चंदन-गेरू जैसे प्राकृतिक हों।
  2. विसर्जन से पहले माला, कपड़ा, प्लास्टिक के तार और थर्मोकोल पूरी तरह उतार लिए जाएं।
  3. विसर्जन चिन्हित कुंड, कृत्रिम टैंक या घर के बड़े गमले में हो; ताकि घुली हुई बची मिट्टी आपके पौधों में जाए और नया जीवन दे।

जो शहर कृत्रिम कुंड बनाकर अवशेष निकालते हैं, वे बोझ नदी पर कम छोड़ते हैं। जश्न और उत्साह कम करने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। जरूरत केवल पूजा की सामग्री बदलने की है।

गणपति विघ्न हरते हैं, उन्हें हमारे जलस्रोतों के लिए विघ्न नहीं बनना चाहिए। विघ्न कभी हमारे द्वार पर होता है, तो कभी उस प्राकृतिक जल धारा में जिसे हम पवित्र कहकर मूर्तियों को विसर्जित करते हैं। यह शपथ धर्मग्रंथ की कोई नई पंक्ति नहीं है। यह शपथ बाजार में मूर्ति खरीदने के लिए हाथ बढ़ाने से पहले का एक संकल्प वाक्य है—इस बार भगवान एक मिट्टी की गणेश मूर्ति के रूप में मिट्टी से आएँ, और सम्मानपूर्वक मिट्टी में ही लौटें। नदी भी हमारे घर का ही आँगन है। बप्पा वहीं सुखी रहेंगे, जहाँ जल भी स्वतंत्र रूप से साँस ले सके।

++++++++++++++++++++++++++ प्रभात दत्त झा देवेन्द्रनगर, नेहरूनगर बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 495001

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