शिवा सिंहल (Champion)
*शीर्षक,,, तुझे ढुंढु कहां:*
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हर नजरें पुकारती है, हर नजरों में तड़प है,
अल्फाज उगलते इश्क, तन्हा रातों सा गगन है
में आशिक दीवाना हो गया जिसका,
पता नहीं कहां ढूंढू ठिकाना उसका ,
ये रात का सन्नाटा काली अमावस से कम नहीं
बहारों ने रंग बरसाया बस गम ये कि वो पास नहीं ,
,जाने क्यूं मन में घुटन सी उठने लगी,
ये तन भी परदेसी लगे कोई तो मुझे बताओ यारो कहां वो,,कहां बहारों का चमन है ,
, बेचैन मन याद में उसकी गीत गुनगुना रहा था
जिसे सुनने वाला ना जाने कहां गुम हो गया था ,
लिखा है कलम ने हमारी कुछ जिसे वो !!
ना,नगमा,ना ग़ज़ल,ना गीत कहती है
अब तुम ही तराशो यार इसे क्या कहते हैं।
मेरी अनपढ़ कलम को थोड़ा,ज्ञान दे जाना,
फिर कोई बहाना करके दिल से खेल ना जाना।
बिखरा हुआ फूल तो मैं पहले से ही हूं ,
मेरे जख्मों पे मरहम की जगह नमक ना लगा जाना ।
जरा सुनो,तुम करतीं हो प्यार हमसे तो प्रिय,,
इक बार तूं दिल लिपट धड़कनों को सुकून दे जाना।
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,,शिवा सिंहल आबुरोड
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Agar शिवा सिंहल ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








