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एक नई सुबह की ओर

Rekha Tomar • Superstar Writer • Sahitya Ratna
एक नई सुबह की ओर

​भोपाल की एक शांत कॉलोनी का वह खूबसूरत सा घर बाहर से देखने पर किसी सपने जैसा लगता था। घर के नामपट्ट पर लिखा था—’समर्पण’। लेकिन इस घर के भीतर दो दिल रहते थे, जो पिछले दो सालों से एक-दूसरे से मीलों दूर जा चुके थे।

​रोहित और मेधा की शादी को सात साल हो चुके थे। शुरुआत के तीन साल किसी सुनहरे सपने की तरह बीते थे—छोटी-छोटी बातों पर हँसना, साथ में चाय पीना, बिना कहे एक-दूसरे की भावनाएँ समझ जाना। रोहित एक प्राइवेट कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर था और मेधा एक फ्रीलांस इंटीरियर डिजाइनर। समय बीतने के साथ रोहित पर काम का दबाव बढ़ता गया और मेधा अपने करियर और घर की जिम्मेदारियों के बीच अकेली पड़ती गई।

​संवाद (Communication) जो किसी भी रिश्ते की बुनियाद होता है, धीरे-धीरे कम होने लगा था। अब उनके बीच बातें सिर्फ इस बात पर होती थीं कि बिजली का बिल भरा गया या नहीं, या रात के खाने में क्या बनेगा।

छोटी-छोटी गलतफहमियाँ इतनी बढ़ गईं कि घर की हवा में एक अजीब सा खिंचाव और चुप्पी तैरने लगी।
​एक शाम, जब बात बेहद मामूली सी थी—रोहित का मेधा के लिए लाया गया एक तोहफा भूल जाना—बहस इतनी बढ़ गई कि दोनों के सब्र का बाँध टूट गया।
​”रोहित, तुम्हें अब मेरी किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता! हम सिर्फ एक छत के नीचे रहने वाले दो अजनबी बन चुके हैं,” मेधा की आँखों में बरसों का दर्द छलक आया।
​”और तुम्हें लगता है कि मैं यहाँ आराम कर रहा हूँ? दिन-रात तुम लोगों की खुशियों के लिए ही तो भाग-दौड़ करता हूँ! तुम्हें कभी मेरी मेहनत नहीं दिखी,” रोहित ने थके हुए स्वर में जवाब दिया।
​उस रात दोनों में से कोई नहीं सोया। अगली सुबह, एक भारी मन के साथ, दोनों ने एक कठिन फैसला लिया—वे अब इस रिश्ते को और नहीं घसीटेंगे। उन्होंने अलग होने (तलाक) का मन बना लिया।

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​टूटने का मोड़ और अहसास

​तलाक की कागजी कार्रवाई शुरू हो गई। दोनों के परिवारों ने समझाने की कोशिश की, लेकिन रोहित और मेधा, दोनों का ही मानना था कि जब रिश्ते में प्यार और सम्मान की जगह सिर्फ शिकायतें बच जाएँ, तो अलग हो जाना ही बेहतर है।
​अदालत ने उन्हें कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले छह महीने का समय दिया—जिसे ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ कहा जाता है। उन्होंने तय किया कि जब तक कानूनी औपचारिकताएँ पूरी नहीं हो जातीं, वे एक ही घर के अलग-अलग कमरों में रहेंगे और बिना किसी झगड़े के शांत माहौल बनाए रखेंगे।
​अलग-अलग कमरों में रहने के शुरुआती दिन बहुत अजीब थे। मेधा जब भी चाय बनाती, उसकी आदत के मुताबिक दो कप बन जाते। रोहित जब भी दफ्तर से लौटता, तो उसका हाथ खुद-ब-खुद मेधा के कमरे का दरवाजा खटखटाने के लिए उठ जाता, लेकिन फिर वह ठिठक जाता।
​घर में शांति तो थी, लेकिन वह शांति किसी सुकून देने वाली छाँव जैसी नहीं, बल्कि एक गहरे सन्नाटे जैसी थी।
​एक दिन अचानक तेज बारिश होने लगी। मेधा बाल्कनी में सूख रहे कपड़ों को समेटने के लिए भागी। हवा इतनी तेज थी कि बाल्कनी का भारी शीशे का गमला नीचे गिरने ही वाला था कि तभी रोहित ने आकर उसे सँभाल लिया। दोनों के हाथ एक-दूसरे से छुए। कुछ पलों के लिए दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा। उन आँखों में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा खालीपन और एक छुपा हुआ सवाल था—क्या सच में सब खत्म हो चुका है?

​बदलाव की बयार

​उसी हफ्ते रोहित की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। उसे बहुत तेज बुखार आया। वह अपने कमरे में अकेला पड़ा कराह रहा था। मेधा चाहती तो अनदेखा कर सकती थी, लेकिन दिल के किसी कोने में छुपा प्यार और इंसानियत उसे रोक नहीं पाई।
​मेधा ने पूरे तीन दिन और रात रोहित की देखभाल की। उसकी पट्टियाँ बदलीं, उसके लिए सूप बनाया, और दवाइयों का वक्त याद रखा। जब रोहित का बुखार उतरा और उसने अपनी आँखें खोलीं, तो उसने देखा कि मेधा कुर्सी पर ही सिर टिकाए सो रही थी। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वह तीन दिनों से सोई नहीं है।
​रोहित की आँखों में आँसू आ गए। उसे अहसास हुआ कि जिस रिश्ते को वह मृत समझ रहा था, उसकी जड़ें अभी भी जिंदा थीं।
​जब रोहित पूरी तरह ठीक हो गया, तो उसने एक दिन मेधा को चाय पर आमंत्रित किया। यह सालों बाद था जब दोनों बिना किसी दफ्तर के काम या शिकायत के, आमने-सामने बैठे थे।

​”मेधा…” रोहित का गला भर आया। “इन तीन दिनों में मुझे अहसास हुआ कि हम कहाँ गलत थे। हमने हमेशा एक-दूसरे से उम्मीदें रखीं, लेकिन कभी एक-दूसरे की थकान को समझने की कोशिश नहीं की। मैं दफ्तर के काम में इतना उलझ गया कि यह भूल ही गया कि रिश्ते को भी वक्त और सींचने की जरूरत होती है।”

​मेधा ने रोहित की तरफ देखा। उसकी आँखों में भी नमी थी। उसने कहा, “गलती सिर्फ तुम्हारी नहीं थी, रोहित। मैंने भी तुम्हारे काम के तनाव को समझने के बजाय सिर्फ अपनी उपेक्षा को देखा। जब बातें बंद हो गईं, तो हमने एक-दूसरे को सुनने के बजाय अपनी-अपनी धारणाएँ बना लीं।”

​एक नई शुरुआत

​उस दिन दोनों ने दिल खोलकर बातें कीं। बरसों की जमी हुई बर्फ पिघलने लगी थी। उन्होंने माना कि शादी का बंधन कोई धागा नहीं है जो एक झटके में टूट जाए, यह तो दो आत्माओं का एक ऐसा सफर है जहाँ रास्ते में गड्ढे भी आते हैं, लेकिन उन गड्ढों के डर से सफर अधूरा छोड़ देना समझदारी नहीं है।
​उन्होंने अदालती कागजात वापस लेने का फैसला किया।
​उन्होंने अपने रिश्ते को सुधारने के लिए कुछ नियम बनाए:
​रोज की बातचीत: चाहे कितना भी काम क्यों न हो, दिन में कम से कम आधा घंटा बिना फोन और लैपटॉप के एक-दूसरे के साथ बिताएंगे।
​बातें न छिपाना: गुस्सा या नाराजगी होने पर मन में दबाने के बजाय तुरंत शांति से कह देंगे।
​एक-दूसरे के काम का सम्मान: दोनों एक-दूसरे के करियर और मानसिक स्थान (Personal Space) की कद्र करेंगे।
​महीनों बाद, ‘समर्पण’ घर में फिर से खिलखिलाहट की आवाजें गूँजने लगीं। शाम की चाय का स्वाद अब पहले से कहीं ज्यादा मीठा लगने लगा था।
​टूटा हुआ बंधन जब फिर से जुड़ा, तो वह पहले से भी ज्यादा मजबूत, समझदार और खूबसूरत हो चुका था। जीवन ने उन्हें सिखा दिया था कि रिश्ते में कभी-कभी फासले भी इसलिए आते हैं ताकि हमें एक-दूसरे की असली कीमत का अहसास हो सके।
​— लेखिका रेखा तोमर

13/10/2026

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