माँ की छाया

*माँ की ओढ़नी*

बरसों से मौसम आते-जाते, माँ का मौसम एक रहा,

खुद भीगती रही सदा, मुझ पर उसका स्नेह रहा।

साड़ी की छोटी-सी छाया, मेरे लिए आकाश बनी,

उसकी हर भीगी हुई सिलवट, मेरी जीवन-ढाल बनी।

मैंने बारिश देखी केवल, उसने चिंता की बूँदें ओढ़ीं,

मेरे हिस्से धूप बचाने, अपनी सारी खुशियाँ छोड़ी।

माँ का आँचल छत नहीं, ईश्वर का ही विस्तार है,

जिसकी छाया में मिट जाए हर भय, हर संताप है।

जब भी जीवन आँधी बनकर, मेरे साहस को परखेगा,

एक भीगी माँ का आँचल ही मुझे सँभालेगा।

ममता का मूल्य कहाँ मिलता, धन-दौलत के बाज़ारों में,

माँ हर मौसम भीग जाती है…

सिर्फ़ बच्चों की मुस्कानों में।

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