Gazal ग़ज़ल है चुप-चुप आसमाँ, कम रोशनी है,किसी की याद हर धड़कन बनी है। बँटवारा चलन ही बन चुका है अब,न साबित रात, टुकड़े चाँदनी है। ना हल्के में घटाओं को समझना,गुँथी उनकी लटों में दामिनी है। है रूठा जो समंदर, कुछ वजह है,कोई ज़िद तो फ़िज़ाओं में ठनी है। जो खुशियों के तराने चाहते … Read more