नारी सशक्तिकरण का तात्पर्य है क्या?
नारी सशक्तिकरण का तात्पर्य मात्र प्रसव पीड़ा सहन शक्ति भर तक है?
या मात्र देवी स्वरूप भर है?
नारी सशक्तिकरण जैसे सशक्त विषय पर जब मेरी वार्तालाप एक वरिष्ठ, पुरस्कृत एवं शिक्षित महिला से हुई तब मेरी पहचान समाज की उन बुद्धिजीवी महिलाओं से हुई जिनकी सोच अशिक्षित महिलाओं के सोच से भी गयी गुज़री है। उस महिला ने नारी की शक्ति को मात्र प्रसव पीड़ा को सहन करने की शक्ति भर स्वीकार किया।
क्या नारी की शक्ति को मात्र प्रसव पीड़ा सहन शक्ति तक परिभाषित करना उचित है?
शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, धर्म, राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, सेना, चिकित्सा जैसे सशक्त विषयों का कोई सरोकार नहीं है नारी की शक्ति से! क्या नारी की शक्ति मात्र गर्भधारण करना एवं प्रसव पीड़ा सहन शक्ति भर तक है?
इसके पश्चात् स्त्री जाति पुरषों पर दोष डालतीं हैं कि पुरुष जाति नारी शक्ति का मूल्यांकन करने में असमर्थ है जबकि नारी स्वयं ही अपनी शक्ति को संकुचित कर रही है।
शिक्षा, धर्म, दर्शन, जाति, वर्ण, समाज, राजनीति जैसे विषयों पर मात्र पुरुषों को ही सोचने, लिखने, बोलने एवं निर्णय लेने का अधिकार है?
स्त्री का इन विषयों से कुछ भी सरोकार नहीं है?
क्या यह सारे विषय मर्दानगी के परिचायक हैं?
क्या मर्दानगी पर मात्र पुरुषों का ही एकाधिकार है ?
जबकि मानव भ्रूण अपने प्रथम चरण में मादा ही होती है। जैसे-जैसे भ्रूण में विकास होता है, वह नर व मादा में परिवर्तित हो जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक पुरुष पहले एक स्त्री ही होती है और प्रत्येक स्त्री में पुरुष छिपा होता है।
अतः मर्दानगी पर मात्र पुरुषों का ही copyright नहीं है।
यह कैसा समाज है जिसमें स्त्री एवं मां को देवी के रूप में पूजा जाता है उसी समाज में स्त्री एवं मां की अवस्था दयनीय है। इसका मुख्य कारण यह है कि समाज, स्त्री एवं मां को मानवाधिकारों से वंचित करना चाहता है।
हम यह भूल गए हैं कि स्त्री बाद में स्त्री है प्रथम वह मनुष्य है ठीक इसी प्रकार मां बाद में मां है प्रथम वह मनुष्य एवं स्त्री है। स्त्री एवं मां की भी अपनी इच्छाएं एवं आवश्यकताएं होतीं हैं। वे स्वयं ही अपनी इच्छाओं एवं आवश्यकताओं का गला घोंट दें इसीलिए स्त्री व मां को देवी का स्थान दिया जाता है। स्त्री व मां अपने अधिकारों के लिए आवाज़ ना ऊंची कर दें इसीलिए इन्हें देवी के रूप में पूजनीय बना दिया गया है।
अतः पुरूषों को अपना दृष्टिकोण स्त्रियों के प्रति बदलने से पूर्व स्त्री को स्त्री के प्रति उच्च दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।read more-
हमारे देश कि सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहां विद्या, धन, शक्ति स्वरूपा स्त्री हैं परन्तु स्त्रियों का ही इनसे नाता नहीं है। कारण यह है कि स्त्रियों को इनसे दूर रखा जाता है और कुछ तो स्वयं ही दूरी बना लेती हैं क्योंकि उनको विलासिता का जीवन एवं धार्मिक कर्मकांड में व्यस्त रहना अधिक प्रिय होता है। और जिन स्त्रियों को इनकी प्राप्ति होती है उनमें से कुछ इनका सदुपयोग करना नहीं चाहती हैं एवं जो इनका सदुपयोग करने के लिए प्रयासरत हैं उनको ये सभी स्त्रियां निराशावाद की ओर धकेल देती हैं।
अतः नारी सशक्तिकरण का तात्पर्य गर्भ धारण कर प्रसव पीड़ा सहन कर मात्र बच्चा जन्म देने तक सीमित नहीं है और ना ही देवी स्वरूपा बन अपनी इच्छाओं का गला घोंटना ही नारी सशक्तिकरण का परिचायक है।
नारी सशक्तिकरण का तात्पर्य यह है कि स्त्री ना तो पुरुष से कमतर है और ना ही पुरुष से सर्वाधिक है, वह तो पुरुष के समांतर है।







