मनुष्य का घुसपैठ
मनुष्य का खान-पान एवं पहनावा उसके परिवेश, प्राकृतिक व्यवस्था एवं जलवायु परिवर्तन पर आधारित है। अतः धर्म, जाति, लिंग जैसे मानव द्वारा निर्मित सामाजिक विभाजनों से ना तो मनुष्य के खान-पान का कुछ लेना-देना है और ना ही मनुष्य के पहनावे का।
क्या मनुष्य का पूर्ण रूप से शाकाहारी बन जाना तर्क संगत है?
क्या पृथ्वी पर इतनी हरियाली शेष है कि यदि पूरी मानव जाति शाकाहारी बन जाती है तो उनका भरण-पोषण अच्छे से हो जाएगा?
क्या पृथ्वी पर इतने भारी संख्या में मानव जाति के भरण-पोषण के लिए पेड़-पौधे उगाने हेतु उपजाऊ भूमि शेष है?
ये सभी प्रश्न, मनुष्य के पूर्ण रूप से शाकाहारी बन जाने के तर्क के समक्ष एक चुनौती के रूप में दृष्टिगोचर हो रहे हैं।
आज एक पोस्ट पढ़ा, जिसमें यह प्रश्न पूछा गया था कि “आदिमानव कौन थे?” इस प्रश्न को पढ़कर मेरे मस्तिष्क में उपरोक्त प्रश्नों की उत्पत्ति हुई है।
वानर से आदि मानव और आदि मानव से मनुष्य की ओर विकास का आधार यदि हम शाकाहार को स्वीकार करते हैं तो यह तथ्य पूर्णतः ही अतार्किक होगा। क्योंकि मनुष्य की मस्तिष्क का विकास शाकाहार से नहीं मांसाहार से हुआ है। प्रायः भारत में यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि, प्राचीन काल से ही भारतीय शाकाहारी भोजन करते आ रहें हैं और बाहरी आक्रांताओं ने हमारे भोजन में मांसाहार को सम्मिलित कर दिया है। जबकि यह पूर्णतः ही मिथ्या है। प्राचीन काल के हमारे पूर्वज, राजा-महाराजाएं क्यों वनों में आखेट (शिकार) करने जाया करते थे? क्या उनका उद्देश्य मात्र मनोरंजन प्राप्त करना होता था? मनोरंजन प्राप्त करने के लिए क्यों कोई अपने प्राणों को जोखिम में डालने जाएगा? इसका सही और सटीक उत्तर यह है कि उनका एकमात्र उद्देश्य होता था अपने भोजन के लिए अन्य जीवों का शिकार करना। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों में, अंधेरी गुफाओं में, घनघोर वनों में तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों को मात्र शास्त्र का ज्ञान ही नहीं होता था, वे अस्त्र-शस्त्र विद्या में भी पारंगत होते थे।
उन्हें अस्त्र-शस्त्र विद्या की क्यों आवश्यकता होती थी? क्या वे केवल अपने शिष्यों को प्रशिक्षित करने के लिए अस्त्र-शस्त्र की विद्या ग्रहण करते थे? इसका सही उत्तर है कि वे मात्र अन्यों को प्रशिक्षित करने के लिए ही अस्त्र विद्या नहीं प्राप्त करते थे अपितु वे स्वयं के आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी अस्त्र विद्या का प्रयोग करते थे।
दिक्कत तब से प्रारम्भ हुआ है जब से मनुष्य की जनसंख्या का विस्फोट हुआ है और हमारी पाचन शक्ति पर हमारी जिह्वा व विभिन्न प्रकार के स्वाद शक्ति ने अधिकार कर लिया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि खाद्य श्रृंखला एवं खाद्य जाल के सर्वोच्च उपभोक्ता मनुष्य बन गया है। मनुष्य मात्र स्थल एवं नदियों के जीवों को ही अपने खाद्य सामग्री में सम्मिलित करने तक सीमित नहीं रहा है, वह समुद्री जीवों को भी अपने खाद्य जाल में सम्मिलित करने में सफल हो गया है। मनुष्य प्रत्येक जीवों के घर में घुसपैठ कर उन्हें अपना खाद्य सामग्री बना रहा है।
जबकि स्थलीय पशु-पक्षी एवं समुद्री जीवों में अभी भी इतना विकास नहीं हुआ है कि वे एक-दूसरे के घर को अपना शिकार क्षेत्र बनाए।
अतः पृथ्वी के इकोसिस्टम के बिगड़ने का मुख्य कारण मनुष्य का मांसाहारी होना नहीं है क्योंकि प्रत्येक कमज़ोर जीव किसी ना किसी बलशाली जीव का भोजन अवश्य है। इसका कारण यह है कि हम मनुष्यों की संख्या समस्त जीवों की संख्या से अत्यधिक बढ़ गई है और हम संसार के समस्त संसाधनों का प्रयोग केवल अपने विकास एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर रहें हैं, जो कि हमें पतन की ओर ही लेकर जा रहा है।






