अधूरे सपने

*अधूरे सपने*

बचपन की धूप में एक सपना पलता था,
हाथ में बल्ला था, दिल में आस जलता था।
हर गली मेरा छोटा-सा मैदान बन जाती,
हर जीत मेरी दुनिया को मुस्कुराती।

मैं भी नीली जर्सी पहनना चाहता था,
तिरंगे के लिए मैदान में उतरना चाहता था।
हर चौके पर माँ की आँखें चमकतीं,
हर विकेट पर खुशियाँ घर तक पहुँचतीं।

मगर एक दिन वक्त ने करवट बदली,
मेरे आँगन की हँसी अचानक थम गई।
पापा की परछाईं मुझसे दूर चली गई,
घर की हर दीवार खामोश हो गई।

उस दिन मैं बेटा कम, पिता ज़्यादा बन गया,
उम्र से पहले ही बड़ा बन गया।
किताबों और क्रिकेट के बीच जो रास्ता था,
वह जिम्मेदारियों की धूल में खो गया।

बल्ला आज भी कोने में चुप खड़ा है,
जैसे मुझसे कोई सवाल बड़ा है।
गेंद की खामोशी मुझे पुकारती है,
हर शाम पुरानी यादें सँवारती है।

मैंने सपनों की जगह राशन उठाया,
अपनी चाहत से पहले घर को बचाया।
बहनों की हँसी मेरी जीत बन गई,
माँ की दुआ मेरी प्रीत बन गई।

कभी-कभी रातों में नींद नहीं आती,
स्टेडियम की आवाज़ बहुत सताती।
लगता है जैसे भीड़ मेरा नाम पुकारे,
और मैं हकीकत की राहें निहारे।

मुझे अफ़सोस नहीं कि सपना अधूरा है,
गर्व है कि मेरा परिवार पूरा है।
कुछ लोग ट्रॉफी उठाकर अमर हो जाते हैं,
कुछ लोग घर संभालकर इतिहास बन जाते हैं।

शायद किस्मत ने बस किरदार बदला है,
मेरे भीतर का खिलाड़ी आज भी ज़िंदा है।
अधूरे सपने कभी मरते नहीं हैं,
वे अपनों की मुस्कान बनकर जीते हैं।

*कुंदन राज दत्ता “निश्छल”*

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कुंदन राज दत्ता "निश्छल"

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5 thoughts on “अधूरे सपने”

  1. बहुत-बहुत-बहुत ज्यादा खूबसूरत, हृदय-स्पर्शी रचना👍👍👌👌👏👏😊🤗

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