आत्महत्या का दोषी कौन?
कौन है दोषी उस बुझती हुई साँस का,
जो हार गई जीवन की हर आस का।
कौन है दोषी उस टूटे हुए मन का,
जो बोझ बन गया अपने ही जीवन का।
क्या दोषी हैं सपने, जो पूरे न हुए,
या वे रिश्ते, जो साथ चल न सके?
क्या दोषी है किस्मत की कड़वी चाल,
या समाज के कठोर सवाल?
जब कोई चुपचाप आँसू पीता है,
दर्द का सागर भीतर ही जीता है।
जब उसकी खामोशी कोई पढ़ न पाए,
और हर उम्मीद धीरे-धीरे मर जाए।
जब अपनों की बातें तीर बन जाती हैं,
और संवेदनाएँ कहीं खो जाती हैं।
जब भीड़ में रहकर भी अकेलापन मिले,
और हर ओर बस अँधेरे ही दिखें।
तब जीवन से विश्वास डगमगाता है,
मन खुद से ही प्रश्न पूछने जाता है।
लेकिन मौत कभी समाधान नहीं होती,
यह तो पीड़ा की अंतिम कहानी होती।
दोषी है वह सोच, जो हौसला तोड़ दे,
दोषी है वह शब्द, जो दिल को छोड़ दे।
दोषी है वह समाज, जो सुनता नहीं,
आँसुओं के पीछे का दर्द चुनता नहीं।
दोषी हैं वे रिश्ते, जो समझते नहीं,
गिरते हुए इंसान को थामते नहीं।
दोषी है वह मौन, जो चीख छिपा लेता है,
जीते-जागते इंसान को मिटा देता है।
पर सबसे बड़ा दोषी निराशा का अँधेरा है,
जो मन पर छा जाए तो सब कुछ बिखेरा है।
इसलिए हर दिल की पुकार सुनो,
गिरते हुए हाथों को प्यार से चुनो।
एक मुस्कान किसी की जान बचा सकती है,
एक उम्मीद नई सुबह ला सकती है।
जीवन अनमोल है, इसे व्यर्थ न जाने दो,
दुख के बादलों को मन पर न छाने दो।
जो टूट रहा हो, उसका सहारा बनो,
अँधेरे में भटकते का सितारा बनो।
तभी मिटेगा यह दर्द भरा प्रश्न महान,
और जीवन पाएगा फिर से सम्मान।
आत्महत्या का दोषी कोई एक नहीं होता,
यह दर्द है, जो धीरे-धीरे मन में रोता।
आओ ऐसा समाज बनाएँ हम सब मिलकर,
जहाँ हर जीवन जीए मुस्कुराकर, खुलकर।
कुंदन राज दत्ता “निश्छल”
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