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सपनों की उड़ान और माटी की महक

Rekha Tomar • Superstar Writer • Sahitya Ratna

सपनों की उड़ान और माटी की महक

गाँव के छोटे से प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में एक अलग ही हलचल थी। नीम के पुराने पेड़ के नीचे रखी पुरानी कुर्सियों पर तीन जज बैठे थे, और उनके सामने लकड़ी की एक लंबी मेज पर दर्जनों सुंदर प्रस्तुतियाँ सजी थीं। यह केवल एक आम स्कूल की प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि इस आंचल की माटी से जुड़े उन तमाम सपनों का इम्तिहान था, जिन्हें अभावों की धूल ने ढक रखा था.

प्रतियोगिता का विषय था— “मेरी सबसे बड़ी सीख”। इस मंच पर हिस्सा लेने वालों में एक नाम ऐसा भी था, जिसकी चर्चा पूरे गाँव में थी— पंद्रह साल की सुरभि। सुरभि के पिता एक साधारण किसान थे, जो सुबह सूरज उगने से पहले खेतों में निकल जाते और देर रात तक पसीना बहाते। घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि महंगी कला सामग्रियां या रंग खरीदे जा सकें, लेकिन सुरभि के भीतर एक अदम्य जिज्ञासा और सृजन की आग थी।

सुबह जब सुरभि ने प्रतियोगिता स्थल पर कदम रखा, तो उसके हाथ में कोई चमकीला कैनवास या रेडीमेड मॉडल नहीं था। उसके पास था तो बस माटी, सूखे पत्तों, खेतों के टूटे हुए तिनके और सबसे बढ़कर, उसके भीतर उबलते हुए जज्बात। उसने एक कोने में अपनी छोटी सी चौकी जमाई और चुपचाप अपने काम में जुट गई।
उसके आसपास खड़े अन्य बच्चे महंगे रंगों और वाटर-कलर से अपनी पेंटिंग को सजा रहे थे। किसी के पास जर्मनी के रंग थे, तो कोई शहर से मंगाए गए महंगे क्राफ्ट किट के साथ आया था। कुछ पल के लिए सुरभि ने उन चमकदार चीजों को देखा, फिर उसने अपने हाथों की ओर देखा जिन पर खेतों की मिट्टी और गन्ने के रस के हल्के निशान थे। उसने लंबी सांस ली, भगवान को मन ही मन याद किया और अपनी कल्पना को साकार करने में खो गई।

सुरभि ने अपनी कलाकृति में किसी महल या हवाई किले को नहीं, बल्कि अपने पिता के झुर्रियों भरे हाथों को उकेरा था। उसने दिखाया कि कैसे वे कठोर हाथों से खेत की बंजर जमीन को चीरकर उसमें जीवन के बीज बोते हैं। उसने मिट्टी से ही एक छोटा सा खेत, उस पर गिरती धूप की किरणें और एक कोने में टंगे हुए पुराने कंधे के झोले को बड़ी बारीकी से गढ़ा था। उस कलाकृति में कोई कृत्रिम चमक नहीं थी, बल्कि उसमें एक सोंधी महक थी— वही सोंधी महक जो पहली बारिश के बाद सूखी धरती से उठती है।

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जैसे-जैसे दोपहर ढलने लगी, जजों ने एक-एक करके सभी प्रतिभागियों की कृतियों का निरीक्षण करना शुरू किया। जब मुख्य जज, जो कला अकादमी के एक प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त प्रोफेसर थे, सुरभि की मेज के पास पहुँचे, तो वे अवाक रह गए। उन्होंने वहाँ कोई व्यावसायिक सुंदरता नहीं देखी, बल्कि उन्हें उस कला में एक जीवंत कहानी दिखाई दी, जो सीधे दिल पर वार कर रही थी।
प्रोफेसर साहब ने झुककर उस मूर्तिनुमा पेंटिंग को छुआ और पूछा, “बेटी, इस पर रंग कौन से इस्तेमाल किए हैं? ये तो बड़े अनोखे और सजीव प्रतीत होते हैं।”

सुरभि ने सहमते हुए लेकिन आदर से उत्तर दिया, “सर, इसमें कोई बाजारू रंग नहीं है। इनमें खेतों की काली मिट्टी, पीपल के सूखे पत्तों का चूर्ण, हल्दी और कुटी हुई मेहंदी की पत्तियों का रस है। पिताजी ने सिखाया है कि असली रंग वही होते हैं, जो प्रकृति खुद हमें देती है।”

वहाँ मौजूद हर व्यक्ति उस बच्ची के उत्तर को सुनकर मंत्रमुग्ध हो गया। जजों के बीच कुछ देर तक फुसफुसाहट चली, और फिर मुख्य जज ने माइक अपने हाथ में लिया। पूरे प्रांगण में पिन-ड्रॉप साइलेंस छा गया।
प्रोफेसर साहब ने गदगद गले से घोषणा की, “आज इस प्रतियोगिता में कई शानदार और महंगे प्रोजेक्ट्स आए हैं, लेकिन जिस कलाकृति ने हम सबका दिल जीता है, वह सिर्फ एक मॉडल नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और सच्चाई का जीवंत दस्तावेज है। प्रथम पुरस्कार जाता है— सुरभि को!”

तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा स्कूल गूँज उठा। सुरभि की आँखें भर आईं। जब वह पुरस्कार लेने मंच पर पहुँची, तो उसकी नजरें भीड़ में खड़े अपने पिता पर पड़ीं, जो अपनी गंदी पगड़ी के पल्लू से बार-बार अपनी नम आँखें पोंछ रहे थे। उस एक पल ने सुरभि के जीवन की सारी कठिनाइयों को मिटा दिया और उसे अहसास कराया कि प्रतिभा को किसी दिखावे की मोहताज नहीं होती, उसे बस सही नीयत और सच्चे जज्बे की जरूरत होती है।
हवाओं के भरोसे न उड़, चट्टानों से टकराना सीख,
माटी की सौंधी खुशबू से अपनी पहचान बनाना सीख।
— लेखिका रेखा तोमर

📅 दिनांक: 15 अक्टूबर 2026

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