खानदानी परिवार की बहू
विक्रम और मीनू की मुलाकात एक दोस्त की शादी के फंक्शन में हुई थी। पहली ही मुलाकात में विक्रम मीनू को पसंद करने लगा था। विक्रम एक सेल्स एग्जीक्यूटिव था और मीनू एक स्कूल में बच्चों को डांस सिखाती थी। विक्रम किसी न किसी बहाने स्कूल में जाकर मीनू से मिला करता था। दोनों की रोज मुलाकात होने लगी और दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। परिवार की राज़ामंदी से दोनों की शादी हो गई।
विक्रम के परिवार वाले थोड़े पुराने ख्यालात के थे, उन्हें बहू का बाहर जाकर काम करना बिलकुल पसंद नहीं था। उनका मानना था कि ‘खानदानी परिवार की बहू’ घर-गृहस्थी संभालती हैं और बेटे की कमाई से घर चलता है। मीनू बहुत समझदार लड़की थी, उसने बड़ों की सोच का सम्मान करते हुए अपनी इच्छाओं को दबा दिया और नौकरी छोड़ दी।
शादी को अभी 7-8 महीने ही हुए थे, और विक्रम को नौकरी से निकाल दिया गया। दो महीने तक विक्रम की सेविंग्स से घर चला, लेकिन बहुत कोशिश करने के बावजूद विक्रम को कोई नई नौकरी नहीं मिल रही थी। ऐसे में अचानक से विक्रम के पिता की तबियत खराब हो गई, लेकिन घर में खाने तक का इंतजाम मुश्किल से हो रहा था, तो इलाज कहां से कराया जाए। डॉक्टर ने भी विक्रम के पिता को जवाब दे दिया था कि अगर समय रहते ऑपरेशन नहीं किया गया तो उनके पिता की जान जा सकती है। विक्रम ने अपने बहुत से रिश्तेदारों से मदद मांगी, लेकिन सभी ने किसी न किसी कारण से मदद करने से इनकार कर दिया।
जब मीनू ने देखा कि विक्रम ने पूरी कोशिश की, लेकिन कहीं से भी मदद नहीं मिल रही, तो उसने अपनी सांस से कहा, “मम्मी, मेरे पास कुछ सेविंग हैं, जो मैंने शादी से पहले नौकरी के दौरान की थी। अगर आपको कोई एतराज़ न हो तो क्या मैं इन्हें पापाजी के इलाज के लिए इस्तेमाल कर सकती हूं?”
मीनू की सांस की आंखें खुल गईं और उसे अपनी गलती पर शर्मिंदगी महसूस हुई। उसे समझ में आ गया कि पुरानी सोच के कारण उसने अपनी बहू की इच्छाओं को दबाया और उसकी खुशियों को नजरअंदाज किया। उसी बहू ने मुश्किल वक्त में उसकी मदद कर, उसके पति की जान बचाई। विक्रम के पिता का इलाज अच्छे से हो गया, वे घर वापस आ गए, और कुछ दिन बाद विक्रम को भी नई नौकरी मिल गई। विक्रम के परिवार में एक परंपरा थी कि सुबह का नाश्ता भले ही सब साथ में न करें, लेकिन रात का खाना सब एक साथ खाते थे। एक दिन रात को सब साथ में बैठकर डाइनिंग टेबल पर डिनर कर रहे थे। मीनू की सांस बोली, “मैं सोच रही थी कि मीनू को फिर से स्कूल में डांस सिखाने की नौकरी शुरू कर लेनी चाहिए।” विक्रम के पिता बोले, “क्या बोल रही हो, यह तो हमारी परंपरा के खिलाफ है। हमारा समाज क्या कहगा?” विक्रम की माँ ने जवाब दिया, “तब समाज कहा था जब तुम जिंदगी और मौत से झूझ रहे थे। दुनिया बदल रही है, हमें भी अपनी छोटी-दक्किया सोच से बाहर आना चाहिए। मैं मीनू को किसी तरह का कोई जोर नहीं देना चाहती। अगर वह नौकरी करना चाहती है तो उसे हमारी तरफ से पूरी छूट है। ‘खानदानी परिवार की बहू’ का मतलब सिर्फ घर में बैठकर रोटियां बनाना और बड़ों का सम्मान करना ही नहीं है। ‘खानदानी परिवार की बहू’ का मतलब बुरे समय में अपने परिवार के लिए खड़े होना है जो उसने बखूबी निभाया है। अब हमारा भी फ़र्ज बनता है कि हम अपनी बहू की इच्छाओं और खुशियों का ध्यान रखें। मैं अपनी बहू के हर फैसले में, उसके साथ हूँ, वो जैसे अपनी जिंदगी जीना चाहती है जी सकती है।”
Shalini









