वो खिलखिलाती है
वो खिलखिलाती है,
वो मुस्कुराती है,
खुले आसमान मे उड़ना चाहती है,
हँस हँस कर बाते करती है,
अच्छा समझ कर तुमसे जुड़ती है,
जब दिखाते हो तुम अपना जाहिलपना,
तो दिल उसका टूट जाता है,
छोड़ कर वो अपनी हँसी,
खामोश बैठ जाती है,
देख के उसका उदास चेहरा,
तुम्हे बहुत मजा आता है,
टूट कर बिखर जाती है वो,
दर्द उसे होता है तुम्हारा क्या जाता है,
तुम जैसे कुछ की वजह से,
हम सारे बदनाम है,
हमे भी शक की निगाहो से देखती है,
इसका भी उसके तरह का ही काम है,
वो खिलखिलाती है,
वो मुस्कुराती है,
खुले आसमान मे उड़ना चाहती है,
हँस हँस कर बाते करती है,
कुछ तो शर्म करो,
अपने अंदर भी झाँका करो,
तुम्हारे घर मे भी होगी स्त्रियां,
अपनी नहीं तो उनके बारे मे सोचा करो,
खुद की बहन बेटियों पे जब गुजरेगी,
बात तुम्हे तब समझ आएगी,
आज नही तो कल,
तुम्हारे घर की औरते भी रोएंगी,
यँहा जो करते हो कारनामा,
सुन उन्हे पछताएंगी,
कैसे कपूत को जन्म दिया,
यह सोच सोच घबराएंगी,
वो खिलखिलाती है,
वो मुस्कुराती है,
खुले आसमान मे उड़ना चाहती है,
हँस हँस कर बाते करती है,
संस्कार तो खूब सिखाया होगा,
बस तुमने ही ना अपनाया होगा,
औरते सिर्फ भोग की वस्तू नही,
पूजा करने जैसी देवी है,
उस माँ की कोई गलती नही,
जिसने तुम्हे जन्म दिया,
ये तो तुम्हारी करनी है,
जिसने अपनी माँ को शर्मशार किया,
स्त्री को जो समझे पैरो की धूल,
सामत उसकी आनी है,
अगर समझते हो उसे पैरो की धूल,
तो है ये तुम्हारी सबसे बड़ी भूल,
इतिहास भी हमारा कहता है,
औरत से बड़ा यौद्धा ना कोई होता है,
वो खिलखिलाती है,
वो मुस्कुराती है,
खुले आसमान मे उड़ना चाहती है,
हँस हँस कर बाते करती है।
कुंदन राज दत्ता “निश्छल”







