पर्वत और नदियाँ

पर्वत और नदियाँ

भागती हुई दुनिया, ठहरी हुई सी शाम,

पर्वत खड़े हैं जैसे कोई मौन प्रणाम।

नदियाँ बहती रहती हैं गीत सुनाती हुई,

पत्थरों की चुप्पी को भी गुनगुनाती हुई।

एक ने ऊँचाई का धैर्य सँभाल रखा,

दूजी ने हर मोड़ पर जीवन संभाल रखा।

पर्वत कहते “अडिग रहो हर हाल में”,

नदियाँ कहती “बहते रहो हर ख्याल में।”

धूप जब चोटियों पर सुनहरी चादर ओढ़े,

घाटी हरियाली के सपनों को धीरे-धीरे जोड़े।

बादल माथे चूमकर आगे निकल जाते हैं,

फिर भी पर्वत अपने वचन कहाँ बदल पाते हैं।

नदी को कोई बाँध ले, फिर भी राह बनाती है,

हर ठोकर को अपनी मुस्कान बनाती है।

चीड़ों की खुशबू हवा में घुल जाती है,

मन की थकी हुई मिट्टी फिर महक जाती है।

कहीं झरनों की हँसी, कहीं चिड़ियों का राग,

प्रकृति लिखती रहती है अपना अनमोल फाग।

पर्वत ने सीखा दिया झुकना नहीं तूफ़ानों से,

नदी ने सिखाया डरना नहीं वीरानों से।

एक आसमान को छूने का सपना रखता है,

एक समंदर से मिलने का अपना वादा रखता है।

दोनों अलग हैं, फिर भी एक कहानी हैं,

साहस और सरलता की सच्ची निशानी हैं।

जब भी मन उलझे जीवन की भीड़ में,

चल पड़ना किसी नदी या पर्वत की पीर में।

वहाँ मिलेगा सुकून बिना किसी शोर के,

अपने ही दिल की धड़कनों के छोर पे।

पर्वत और नदियाँ बस दृश्य नहीं होते,

ये इंसान के भीतर के रिश्ते भी होते।

एक हमें जड़ें देता, एक उड़ान देती है,

प्रकृति हर साँस में जीने की पहचान देती है।

कुंदन राज दत्ता “निश्छल”

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