सवाल थे खड़े, जिनका जवाब लगता है,
अभी का नहीं, पुराना हिसाब लगता है।
समंदरों की सच्चाई यह भी होती है,
बहता- जीवन,उछलता- अज़ाब लगता है।”
पढ़ते हैं इस तरह से सभी काम छोड़,
वजूद मेरा सभी को किताब लगता है।
उठा अभी सोकर, ख़्वाब थका-रोकर,
अब तोड़ेगा बेड़ियाँ, बेताब लगता है।
ख़ुशबू है, रंग भी है, यादों का नूर,
चेहरा वो ख़ूबसूरत गुलाब लगता है।
सुर गए हैं डूब, साज़-ए-ख़ुशी हुई ऊब,
नियति का टूटता-सा रबाब लगता है।
प्यार भी तो इबादत का एक तरीका,
चुके नहीं जन्मों, बेहिसाब लगता है।
रहना भी और सहना भी, जूझना भी है,
मतलब ही ज़िंदगी का अज़ाब लगता है।
— क्षमा उर्मिला
Whatsapp Number : usp_whatsapp : 7770903337
Support Writer
Agar Kshama Urmila ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








