शायर का ख्याल
लगती हो तुम किसी गहरे शायर का हसीन ख्याल,
जैसे कोरे कागज़ पर उतरा हो कोई अनकहा सवाल।
तुम्हारी आँखों में सिमटी है सदियों की कोई दास्ताँ,
जैसे थमी हो पलकों पर बहती हुई एक नज़्म जवां।
तुम वो लफ़्ज़ हो जिसे ढूँढता है कोई मुसाफ़िर राही,
तुम वो हकीकत हो जिसे लफ्जों में पिरोती है स्याही।
जब तुम चलती हो तो लगता है कोई ग़ज़ल गुनगुनाई है,
जैसे तपती धूप में किसी ने ठंडी छाँव बिछाई है।
तुम्हारे चेहरे का नूर जैसे पूर्णिमा का महकता चाँद,
जैसे किसी सूफी की इबादत, जैसे मंदिर का मधुर नाद।
नजाकत तुम्हारी ऐसी कि फूल भी तुम पर फिदा हो जाएँ,
तुम्हें देखने को खुद कुदरत के नज़ारे भी ठहर जाएँ।
तुम किसी मंज़र की वो पहली सुहानी सी भोर हो,
खामोशियों के दरमियाँ तुम मोहब्बत का शोर हो।
कभी तुम मीर की सादगी, कभी ग़ालिब का अंदाज़ हो,
किसी पुराने साज़ से निकलता हुआ तुम मधुर साज़ हो।
वो जुल्फ़ें जो रुखसार पर आकर अक्सर ठहर जाती हैं,
मानो बादलों के पीछे से धूप की किरणें मुस्काती हैं।
तुम्हारे लबों की हंसी जैसे कोयल की कोई कूक है,
तुम्हें पाने की चाहत ही तो रूह की असली भूख है।
तुम ख़्वाब हो जिसे रातों में हकीकत की तलाश है,
तुम प्यास हो जिसे सावन के बूंदों की ही आस है।
शायर की कलम जब भी कोई मुकम्मल शेर लिखती है,
अजीब है कि हर बार उसमें बस तेरी ही सूरत दिखती है।
तुम समंदर की लहरों का वो शोर हो जो सुकून देता है,
तुम वो इत्र हो जिसकी खुशबू से ये जहाँ महक उठता है।
किसी दरगाह की मन्नत की उस रंगीन धागे जैसी हो,
तुम खुदा की बनाई हुई सबसे खूबसूरत दुआ जैसी हो।
तुम्हारे होने से ही महफ़िल में रौनक़ और जान आती है,
जैसे पतझड़ के बाद फिर से बहारें मुस्कुराती हैं।
तुम कोई ख्याल नहीं, तुम तो कायनात का एक सार हो,
मेरे दिल के वीराने में बसी हुई तुम पहली बहार हो।
लिखना चाहूँ जो तुम पर, तो सदियाँ भी कम पड़ जाएँ,
पढ़ना चाहूँ जो तुम्हें, तो अल्फाज़ खुद-ब-खुद थम जाएँ।
बस इतना समझ लो कि तुम एक मुकम्मल सी मिसाल हो,
लगती हो तुम वाकयी किसी शायर का सबसे हसीन ख्याल हो।
कुंदन राज दत्ता “निश्छल”
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