मोहब्बत का गुलाबी रंग

मोहब्बत का गुलाबी रंग 

गुलाबी आभा में तुम,
जैसे भोर की पहली लाली,
सज गई हो प्रेम की देवी,
बनकर मन की हरियाली।

माथे की बिंदी कहती है,
चाँद भी तुमसे शरमाए,
माँग का सिंदूर सुहाग बन,
जीवन में मधुमास जगाए।

मोती जड़ी वह मांगटीका,
नभ के तारों-सा दमके,
नयनों की गहरी चितवन में,
लाखों सावन आकर थमके।

अधरों पर मुस्कान खिले,
जैसे गुलाब की कोमल पंखुड़ी,
हर धड़कन में घुलती जाती,
प्रेम सुधा की मधुर झड़ी।

गोल नथ की स्वर्णिम रेखा,
मुख पर चाँद सजाती है,
देख तुम्हें हर साँस मेरी,
गीत नया गुनगुनाती है।

मेहँदी रँगे ये कोमल हाथ,
प्रेम कथा लिखते जाएँ,
कंगनों की मधुर खनक से,
सपनों के दीप जगाएँ।

गुलाबी चुनर लहराकर,
जैसे बादल धरती चूमे,
तेरे रूप के आगे ऋतु भी,
अपना हर श्रृंगार भूले।

तेरी पलकों की छाँव तले,
मन को विश्राम मिला है,
तेरे रूप के एक दर्शन में,
जीवन का धाम मिला है।

मंगलसूत्र की काली डोरी,
अटूट प्रेम का मान बने,
हर जन्मों के पावन बंधन की,
अमिट सजी पहचान बने।

कानों की झूमर हिलती है,
जैसे राग मल्हार बहे,
तेरी धीमी-सी हर मुस्कान में,
सौ प्रेमिल त्योहार रहे।

रूप तेरा मंदिर की ज्योति,
मन मेरा आरती बन जाए,
तेरे चरणों की धूल पाकर,
हर अभिलाषा सफल हो जाए।

जब तुम यूँ दर्पण-सी हँसती,
मौसम भी इठलाने लगता,
सूना-सूना मन का आँगन,
फूलों से भर जाने लगता।

तुम प्रेयसी भी, तुम ही पूजा,
तुम ही जीवन की मधुबन हो,
मेरे हर लिखे हुए छंदों की,
सबसे सुंदर स्पंदन हो।

ईश्वर ने फुर्सत में शायद,
प्रेम का चित्र उकेरा है,
तभी तो तेरे रूप में उसने,
सौंदर्य स्वयं बिखेरा है।

मेरी हर कविता का अर्थ तुम,
हर उपमा की पहचान हो,
गुलाबी श्रृंगार में सजी प्रिये,
तुम मेरे हृदय की जान हो।

*कुंदन राज दत्ता “निश्छल”*

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कुंदन राज दत्ता "निश्छल"

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