दिनांक: 22 अगस्त 2026
दिन: शनिवार
विषय: भ्रष्ट तंत्र
तंत्र की नस-नस में,
जहर घोल रहा है।
हर एक ईमानदार यहाँ,
खामोश बोल रहा है।
फाइलों के बोझ तले,
अरमान दबे जाते हैं।
घूसखोरों के चेहरे,
सरेआम हँसे जाते हैं।
न्याय बिक रहा मंडी में,
कानून अंधा हुआ है।
हर तरफ बेबस इंसाँ,
फिर से ठगा हुआ है।
मेहनतकश की छाती पर,
खड़े दलाल दिखाई दें।
कुर्सियों के अंधेपन में,
बस ख्यालात बिकाई दें।
दीमक सी लग गई है,
इस प्यारी सी काया को।
कोई तो रास्ता दो अब,
इस डूबती हुई छाया को।
बदलाव की इस आंधी में,
अब दीप जलाना होगा।
इस भ्रष्ट व्यवस्था को,
मिलकर के हराना होगा।
शायरी:
कुर्सियों की भूख में ईमान बेच आते हैं लोग,
चंद सिक्कों की खातिर जमीर बेच आते हैं लोग!
कब तक सहेगा जुल्म ये खामोश आवाम यारो,
अब तो जागने का वक्त है, आवाज बुलंद कर लो यारो!
— लेखिका रेखा तोमर मैहर









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