गुरु पूर्णिमा – सबसे बड़ा उपहार
गाँव के छोटे-से विद्यालय में पढ़ने वाला आरव एक होनहार, लेकिन बेहद गरीब छात्र था। उसके पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में काम करती थीं। आर्थिक तंगी के कारण कई बार उसे पढ़ाई छोड़ने का मन हुआ, लेकिन उसके गुरु, आचार्य शेखर जी, हमेशा कहते थे, “बेटा, परिस्थितियाँ कभी किसी की मंज़िल तय नहीं करतीं, मेहनत और शिक्षा करती है।”
आचार्य जी केवल पाठ्यपुस्तकें ही नहीं पढ़ाते थे, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते थे। जब आरव के पास किताबें नहीं थीं, तो उन्होंने अपनी निजी पुस्तकों का संग्रह उसके लिए खोल दिया। परीक्षा के दिनों में वे विद्यालय के बाद भी उसे निःशुल्क पढ़ाते रहे। धीरे-धीरे आरव का आत्मविश्वास बढ़ता गया। समय बीता। आरव ने कठिन परिश्रम किया और उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी बन गया। वर्षों बाद ‘गुरु पूर्णिमा’ का दिन आया। विद्यालय में एक सादा-सा समारोह आयोजित था। उसी समय एक चमचमाती गाड़ी विद्यालय के द्वार पर आकर रुकी। उसमें से उतरा एक सुसज्जित अधिकारी सीधे आचार्य शेखर जी के चरणों में झुक गया।
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आचार्य जी ने उसे पहचानने की कोशिश की। वह मुस्कुराकर बोला, “गुरुजी, मैं आपका वही आरव हूँ, जिसे आपने कभी टूटने नहीं दिया।” गुरुजी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “आज मेरी सबसे बड़ी गुरु-दक्षिणा यही है कि तुम एक अच्छे इंसान बने।” आरव ने उत्तर दिया, “गुरुजी, आपने मुझे केवल अक्षर नहीं सिखाए, बल्कि संघर्ष में मुस्कुराना, असफलता में धैर्य रखना और सफलता में विनम्र रहना भी सिखाया। यदि आपके विश्वास का सहारा न मिला होता, तो मैं आज यहाँ न होता।”
पूरा विद्यालय तालियों से गूँज उठा। उस दिन सभी विद्यार्थियों ने समझ लिया कि सच्चा गुरु वही है, जो केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि अपने शिष्य के भीतर छिपे प्रकाश को पहचानकर उसे जीवन भर उजाला बनने की प्रेरणा देता है।
गुरु पूर्णिमा हमें यही संदेश देती है कि माता-पिता जीवन देते हैं, पर गुरु उस जीवन को दिशा, उद्देश्य और उज्ज्वल भविष्य प्रदान करते हैं। गुरु का ऋण धन से नहीं, बल्कि उनके आदर्शों पर चलकर ही चुकाया जा सकता है।
©️✍️शशि धर कुमार, कटिहार, बिहार
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