परछाईयाँ
धूप की गोद में पलती परछाईयाँ
शाम हर रोज़ ही ढलती परछाईयाँ
ना दिखे दौड़ती यायावर बन चुकीं
रोशनी को पकड़ चलती परछाईयाँ
दीपकों के तले हैं उपेक्षित बहुत
देखती हूँ मैं अब जलती परछाईयाँ
जब लपेटे प्रभा बढ़ती धागों सी ये
रील जैसे बढ़े छलती परछाईयाँ
बन पसीना ये जब बूंदों में बह चलीं
धूप में मोम सी गलती परछाईयाँ
खाए धोखा है वो अपने ही साये से
ये वजह है उसे खलती परछाईयाँ
क्या दिखाना है और क्या छुपाना उन्हें
है अलग माप पर फलती परछाइयाँ
है हथेली रवि और किरण उँगलियाँ
हैं अदब से इन्हें मलती परछाईयाँ
जब झगड़ने लगें ताप और रोशनी
शीत का पंख तब झलती परछाईयाँ
हर पहर ले बदल रूप अपना भले
फिर भी टाले नहीं टलती परछाईयाँ
– क्षमा उर्मिला
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