Gazal
ग़ज़ल
है चुप-चुप आसमाँ, कम रोशनी है,
किसी की याद हर धड़कन बनी है।
बँटवारा चलन ही बन चुका है अब,
न साबित रात, टुकड़े चाँदनी है।
ना हल्के में घटाओं को समझना,
गुँथी उनकी लटों में दामिनी है।
है रूठा जो समंदर, कुछ वजह है,
कोई ज़िद तो फ़िज़ाओं में ठनी है।
जो खुशियों के तराने चाहते हैं,
उन्हीं की जेब में हर रागिनी है।
स्वरों की दास्ताँ मैं क्या सुनाऊँ,
हैं बिखरे शब्द, ग़ज़लें अनमनी हैं।
— क्षमा उर्मिला
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Kshama Urmila
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