*वो कत्थई आँखों वाली*
वो कत्थई आँखों वाली,
आज फिर याद आ गई।
शाम ने जब चुपके से आँचल फैलाया,
तेरी हँसी हवा में महक बन छा गई।
चाँद खिड़की पर ठहरा रहा,
मेरी तन्हाई तुझे पुकारती रही।
हर धड़कन ने तेरा नाम लिखा,
हर साँस तेरी राह निहारती रही।
तेरी आँखों का कत्थई समंदर,
आज भी मुझे डुबो जाता है।
उनमें छिपे अधूरे वादे,
दिल को चुपके रुला जाता है।
तेरी ज़ुल्फ़ों की नरम छाँव,
अब भी रातों में उतरती है।
तेरे माथे की वो मासूम बिंदिया,
मेरी दुआओँ में सँवरती है।
याद है वो पहली मुलाक़ात,
जब वक़्त ठहर सा गया था।
एक नज़र ने ऐसा जादू किया,
दिल हमेशा के लिए तेरा हुआ था।
तेरी पायल की मीठी छनक,
अब भी कानों में गूँजती है।
सूनी राहों की हर ख़ामोशी,
बस तेरी बातें पूछती है।
मैं किताबों में तुझे ढूँढता हूँ,
बारिश में तेरा चेहरा दिखता है।
हर भीगी हुई ख़ुशबू में,
तेरा ही एहसास महकता है।
लोग कहते हैं भूल जाओ,
पर इश्क़ कहाँ भुलाया जाता है।
जो रूह में उतर जाए,
वो कहाँ मिटाया जाता है।
तेरी मुस्कान मेरी इबादत,
तेरा नाम मेरा सुकून रहा।
तू दूर होकर भी मेरे दिल में,
सबसे क़रीब का जुनून रहा।
अगर कभी फिर मिलना हो,
तो बस यूँ ही मुस्कुरा देना।
इन बेचैन धड़कनों को,
अपनी कत्थई आँखों में फिर बसा लेना।
*कुंदन राज दत्ता “निश्छल”*







