शीर्षक-कलयुग
यहां सत्य का कोई साथी नहीं,
सब बन बैठे असत्य के साथी है,
यहां रिश्तों का कोई मोल नहीं,
आया देखो ये कैसा कलयुग है।।
पति के जाते ड्यूटी पर पत्नी,
गैर मर्द के साथ रात बिताती है,
यहां कोई रिश्तों का मोल नहीं,
आया देखो ये कैसा कलयुग है।।
यहां पति भी पत्नी से कम नहीं,
वो भी देता पत्नी को खूब धोखा है,
यहां कोई रिश्तों का मोल नहीं,
आया देखो ये कैसा कलयुग है।।
यहां कोई अपना मित्र नहीं
यहां सब मतलब के साथी है,
कोई रिश्तों का यहां मोल नहीं,
आया देखो कैसा ये कलयुग है।।
भाई बहनों में भी प्रेम नहीं,
बहन बन बैठी भाई की दुश्मन है,
कोई रिश्तों का यहां मोल नहीं,
आया देखो कैसा ये कलयुग है।।
भाई-भाई में भी यहां पटा नहीं,
सब जग माया के फरेब में अंधे है,
कोई रिश्तों का यहां मोल नहीं,
आया देखो कैसा ये कलयुग है।।
एकता चतुर्वेदी✍️