बच्चे बड़े हो गए… अब मैं कहाँ हूँ?
बच्चों के बड़े होने की खुशी हर माँ के लिए अनमोल होती है।
उनके छोटे-छोटे कदमों से लेकर अपने फैसले खुद लेने तक का सफर देखते हुए माँ को लगता है—शायद मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी पूरी हो गई।
लेकिन इसी खुशी के बीच, एक दिन मन बहुत धीरे से पूछता है—
**“अब मैं कहाँ हूँ?”**
यह सवाल बच्चों से शिकायत नहीं है।
न उनके दूर होने का डर है।
बस अपने भीतर झाँकने की एक कोशिश है।
क्योंकि माँ बनते ही हमारी जिंदगी का केंद्र बदल जाता है। सुबह बच्चों की जरूरतों से शुरू होती है और रात उनकी चिंता के साथ खत्म। उनके स्कूल, पढ़ाई, पसंद-नापसंद, सपने, परेशानियाँ… सब धीरे-धीरे हमारी अपनी प्राथमिकताओं पर हावी हो जाते हैं।
और हमें इसका एहसास भी नहीं होता।
Maa Ki Chithi: 1 Unforgettable भावुक हिंदी कहानी
हम अपने सपनों को यह कहकर थोड़ी देर के लिए किनारे रख देते हैं—
“अभी बच्चे छोटे हैं…”
फिर कहते हैं—
“अभी उनकी पढ़ाई चल रही है…”
फिर—
“अभी उन्हें मेरी जरूरत है…”
और देखते-देखते वही “अभी” कई वर्षों में बदल जाता है।
फिर एक दिन बच्चे अपने रास्ते पहचानने लगते हैं।
उनकी दुनिया बड़ी होने लगती है।
उनके पास अपने दोस्त होते हैं, अपने फैसले होते हैं, अपनी व्यस्तताएँ होती हैं।
और माँ?
माँ के पास अचानक थोड़ा-सा खाली समय आ जाता है।
यही वह समय है जब कई स्त्रियाँ पहली बार अपने भीतर की उस आवाज़ को सुनती हैं, जिसे वर्षों से बाकी सबकी आवाज़ों के नीचे दबा दिया था।
वह आवाज़ पूछती है—
**“तुम्हें क्या पसंद है?”**
**“तुम क्या करना चाहती हो?”**
**“तुम्हारा अपना सपना क्या था?”**
इन सवालों के सामने खड़ी स्त्री को अपने उत्तर तलाशने में समय लग सकता है।
क्योंकि उसने वर्षों तक सबके बारे में सोचा है,
अब उसे अपने बारे में सोचना फिर से सीखना है।
लेकिन इसमें अपराधबोध कैसा?
बच्चों को उड़ना सिखाने वाली माँ को अपनी उड़ान याद आ जाए, तो यह स्वार्थ नहीं है।
अपने लिए समय निकालना परिवार से प्रेम कम करना नहीं है।
अपने सपनों को फिर से छूना बच्चों से दूरी बनाना नहीं है।
और अपनी पहचान तलाशना माँ होने की भूमिका को छोटा करना तो बिल्कुल नहीं।
बल्कि शायद यही वह सबसे खूबसूरत बात है जो एक माँ अपने बच्चों को सिखा सकती है—
**कि जीवन में जिम्मेदारियाँ जरूरी हैं, लेकिन अपने अस्तित्व को भूल जाना जरूरी नहीं।**
बच्चों को हमने रास्ते दिखाए हैं,
अब अपने लिए भी कोई रास्ता चुन सकते हैं।
जिस किताब को कभी पढ़ना चाहा था, उसे पढ़ सकते हैं।
जिस हुनर को कभी समय नहीं मिला, उसे सीख सकते हैं।
जिस सपने को अलमारी में रख दिया था, उसकी धूल झाड़ सकते हैं।
उम्र चाहे जो हो, शुरुआत कभी देर से नहीं होती।
क्योंकि माँ होना मेरी पहचान का एक सुंदर हिस्सा है,
लेकिन **मेरी पूरी पहचान नहीं।**
मेरे भीतर एक स्त्री भी है—
जिसके अपने सपने हैं, अपने सवाल हैं, अपनी पसंद है, अपनी आवाज़ है।
शायद बच्चों का बड़ा होना मेरी भूमिका का अंत नहीं था।
**वह तो मेरे भीतर बची उस स्त्री से दोबारा मिलने की शुरुआत थी,
जिसे मैंने वर्षों तक सबके बाद रखा था।**
और अब जब बच्चे अपनी उड़ान भर रहे हैं,
तो शायद मुझे भी अपने पंखों की ओर देखना चाहिए।
क्योंकि—
**बच्चों को पंख देना माँ का प्रेम है,
और अपने पंख पहचान लेना—उसका आत्मसम्मान।**
❝© स्वीटी श्रीवास्तव❞
*जज़्बातों की पोटली से*
Whatsapp Number : usp_whatsapp : 8808446666
Support Writer
Agar Sweety Srivastava ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:









1 thought on ““बच्चे बड़े हों गए….. अब मैं कहाँ हूँ??””