माँ की ओढ़नी

माँ, आँचल,त्याग, मातृ *1- माँ की ओढ़नी* बरसों से मौसम आते-जाते, माँ का मौसम एक रहा, खुद भीगती रही सदा, मुझ पर उसका स्नेह रहा। साड़ी की छोटी-सी छाया, मेरे लिए आकाश बनी, उसकी हर भीगी हुई सिलवट, मेरी जीवन-ढाल बनी। मैंने बारिश देखी केवल, उसने चिंता की बूँदें ओढ़ीं, मेरे हिस्से धूप बचाने, अपनी सारी खुशियाँ छोड़ी। माँ का आँचल छत नहीं, ईश्वर का ही विस्तार है, जिसकी छाया में मिट जाए हर भय, हर संताप है। जब भी जीवन आँधी बनकर, मेरे साहस को परखेगा, एक भीगी माँ का आँचल ही मुझे सँभालेगा। ममता का मूल्य कहाँ मिलता, धन-दौलत के बाज़ारों में, माँ हर मौसम भीग जाती है… सिर्फ़ बच्चों की मुस्कानों में।प्रेम

कलयुग- एकता चतुर्वेदी Emotional Poetry by Muktika Publication

शीर्षक-कलयुग यहां सत्य का कोई साथी नहीं,सब बन बैठे असत्य के साथी है,यहां रिश्तों का कोई मोल नहीं,आया देखो ये कैसा कलयुग है।।पति के जाते ड्यूटी पर पत्नी,गैर मर्द के साथ रात बिताती है,यहां कोई रिश्तों का मोल नहीं,आया देखो ये कैसा कलयुग है।।यहां पति भी पत्नी से कम नहीं,वो भी देता पत्नी को खूब … Read more