कुंठा : मन की सबसे बड़ी कैद

कुंठा : मन की सबसे बड़ी कैद

कुंठा : मन की सबसे बड़ी कैद

कुंठा किसी एक दिन में जन्म नहीं लेती। यह धीरे-धीरे हमारे मन में तब घर बनाती है, जब हम अपने जीवन की तुलना दूसरों की उपलब्धियों से करने लगते हैं। हमें लगने लगता है कि सफलता केवल दूसरों के हिस्से में है और हम पीछे छूट गए हैं। यही सोच निराशा, ईर्ष्या और असंतोष को जन्म देती है।

आज के प्रतिस्पर्धी युग में हर व्यक्ति आगे निकलना चाहता है। इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन जब दूसरों की सफलता हमें प्रेरित करने के बजाय भीतर ही भीतर जलाने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि कुंठा हमारे मन पर अधिकार करने लगी है। ऐसा व्यक्ति स्वयं भी सुखी नहीं रह पाता और अपने रिश्तों में भी सहजता खो देता है।

वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति का जीवन, संघर्ष और समय अलग होता है। किसी की सफलता देखकर स्वयं को असफल मान लेना उचित नहीं। असफलता अंत नहीं, बल्कि स्वयं को और बेहतर बनाने का अवसर है। जो व्यक्ति अपनी कमियों को स्वीकार कर मेहनत का मार्ग चुनता है, वही कुंठा की बेड़ियाँ तोड़कर आगे बढ़ता है।

कुंठा का उपचार दूसरों को पीछे खींचना नहीं, बल्कि स्वयं को आगे बढ़ाना है। सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास, निरंतर प्रयास और संतोष—यही वे दीप हैं जो मन के अंधकार को दूर करते हैं। जब हम तुलना छोड़कर अपने लक्ष्य पर ध्यान देना सीख जाते हैं, तब कुंठा स्वतः समाप्त होने लगती है।

*कुंठा से नहीं, कर्म से पहचान बनाइए; क्योंकि दूसरों की ऊँचाई देखकर नहीं, स्वयं की क्षमता पहचानकर ही जीवन की सच्ची सफलता प्राप्त होती है।
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स्वरचित ✍🏼✍🏼
स्वीटी श्रीवास्तव
वाराणसी, उत्तरप्रदेश

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