चलती रही तो राह बनती गई
काँटों भरी राहों पर भी, हँसकर चलती रही,
आँधियों में आशा का दीप बनकर जलती रही।
कदम-कदम पर ठोकरें थीं, प्रश्नों के जंजाल थे,
मेरे दृढ़ संकल्प के आगे, बौने हर व्यवधान थे।
किसी ने कहा, ठहर जा, मंज़िल बहुत दूर है,
मैंने कहा, चलते रहना ही, सपनों का नूर है।
आँखों में सपने पलते थे, मन में विश्वास था,
गिरकर फिर उठ जाना ही, मेरा दृढ़ प्रयास था।
न शिकायतों में उलझी, न भाग्य को कोसती रही,
अपने श्रम से अपनी तक़दीर, खुद ही लिखती रही।
कभी धूप ने राहें रोकीं, कभी छाँव ने पुकारा,
हर मुश्किल ने मुझे सँवारा, हर अनुभव ने निखारा।
जो राह नहीं थी, उसको अपने कदमों से बनाया,
जो सपना अधूरा था, उसको सच करके दिखाया।
मेरी उड़ान से जागी, कितनों के मन में आस,
मेरे संघर्षों ने रच दिया, साहस का इतिहास।
चलती रही तो राह बनती गई,
हर मुश्किल में हिम्मत बढ़ती गई।
मैं स्त्री हूँ, मेरी शक्ति ही मेरी पहचान है,
मेरे अडिग हौसलों में बसा, मेरा आसमान है।
स्वरचितएवं मौलिक
© स्वीटी श्रीवास्तव
जज़्बातों की पोटली से
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Agar Sweety Srivastava ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








