खानदानी परिवार की बहू
राजस्थान के जयपुर में स्थित “राजावत हवेली” अपनी शान-ओ-शौकत और पारंपरिक रीति-रिवाजों के लिए मशहूर थी। इस हवेली के मालिक ठाकुर रणवीर सिंह राजावत एक सख्त मिजाज इंसान थे, जो खानदानी रिवाजों को दिल से मानते थे। उनके परिवार की हर बहू ने इन परंपराओं का पालन किया था, और इस बार घर में नई बहू के रूप में दिया का आगमन हो रहा था।
रोहणी दिल्ली की एक शिक्षित और आत्मनिर्भर लड़की थी, जिसने अपनी पढ़ाई विदेश में पूरी की थी। जब उसकी शादी यशवर्धन सिंह राजावत से हुई, तो पूरे जयपुर में यह चर्चा थी कि “देखते हैं, यह पढ़ी-लिखी लड़की राजावत परिवार के संस्कारों में कितनी ढल पाती है!”
पहली बार जब रोहणी ने हवेली में कदम रखा, तो उसे पूरे परिवार ने पारंपरिक अंदाज में स्वागत किया। लेकिन वह जल्द ही समझ गई कि यह घर जितना भव्य दिखता था, उतने ही सख्त नियमों से बंधा था।कि बहुएँ घूँघट में रहेंगी।
बिना पूछे घर के फैसलों में हिस्सा नहीं लेंगी।
घर की बहुएँ नौकरी नहीं करेंगी।
महिलाओं को हवेली से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी, सिवाय पारिवारिक आयोजनों के।
रोहणी के लिए यह सब नया था। उसने पहली बार खुद को एक पिंजरे में कैद महसूस किया। वह पढ़ी-लिखी थी और समाज के लिए कुछ करना चाहती थी, लेकिन उसे चुप रहने को कहा गया।
एक दिन, उसने देखा कि हवेली की देखभाल करने वाली गीता अपनी बेटी रीना को स्कूल नहीं भेज रही थी। रोहणी ने जब इसका कारण पूछा, तो सीता ने कहा, “हमारे समाज में लड़कियाँ स्कूल नहीं जातीं, हम बस काम करने के लिए पैदा होते हैं।”
रोहणी को यह बात दिल पर लगी। उसने रीना को पढ़ाने का फैसला किया। लेकिन जब यह बात ठाकुर रणवीर सिंह को पता चली, तो उन्होंने गुस्से में कहा, “हमारी बहूओं का काम घर संभालना है, समाज सुधारना नहीं!”
रोहणी ने विनम्रता से जवाब दिया, “बाबा साहब, असली खानदानी रिवाज वही होते हैं, जो समय के साथ बदल सकें। जो परंपरा किसी की ज़िंदगी सुधार सकती है, उसे अपनाने में क्या बुराई?”
पहले तो पूरा परिवार रोहणी के खिलाफ हो गया, लेकिन धीरे-धीरे यशवर्धन ने उसका साथ देना शुरू किया। उसने अपने पिता को समझाया कि परंपराएँ तभी महान बनती हैं जब वे समाज की भलाई के लिए काम करें।
धीरे-धीरे, ठाकुर रणवीर सिंह को अहसास हुआ कि उनकी बहू सच कह रही थी। उन्होंने पूजा को स्कूल भेजने की अनुमति दी और हवेली में काम करने वाली दूसरी महिलाओं के बच्चों को भी पढ़ाने का फैसला किया।
कुछ महीनों बाद रोहणी ने हवेली के एक हिस्से को महिलाओं और बच्चों के लिए शिक्षा केंद्र में बदल दिया। अब हवेली की पहचान सिर्फ उसकी भव्यता से नहीं, बल्कि वहाँ से निकली नई सोच से भी थी।
रोहिणी ने यह साबित कर दिया कि “खानदानी परिवार की बहू” होने का मतलब सिर्फ रीति-रिवाज निभाना नहीं, बल्कि परिवार की गरिमा बनाए रखते हुए समाज में बदलाव लाना भी है। आज राजावत हवेली की बहूओं को लोग आदर्श मानते हैं—क्योंकि उन्होंने परंपराओं को सम्मान दिया, लेकिन समय के साथ उन्हें बेहतर भी बनाया।
रचनाकार
सुरभि श्रीवास्तव
75, सिविल लाइन अस्ती कोतवाली रोड,
फतेहपुर ( उत्तर प्रदेश)
212601








