Bhawana Bhatt (Star Writer)
घोंसला
4- 10 – 2026
जीवन का सत्य
मेरे घर के सामने एक बड़ा सा आम का पेड़ है। उसमें हर साल एक चिड़िया का घोंसला बनता है। हर वर्ष एक ही समय पर एक चिड़िया का जोड़ा वहाँ आता है और अपना घोंसला बनाता है। फिर कुछ दिनों बाद उसमें वे अंडे देते हैं।
फिर वे अंडों को सेते हैं और कुछ दिन के बाद उन अंडों से बच्चे निकलते हैं। चिड़िया के घोंसले में बच्चों की चहचहाहट गूँजने लगती है। और चिड़िया का घोंसला एक आनन्ददायक घर बन गया। कुछ दिनों बाद बच्चे बड़े हुये अब वे पेड़ पर बने घोंसले से नीचे आँगन में उतरने लगे दाना चुगने के लिए। और फिर एक दिन सब उड़कर चले गए। अब घोंसला बीरान हो गया। अगले साल फिर उसी मौसम में एक चिड़िया का जोड़ा उसी पेड़ पर अपना घोंसला बनाने लगा।
तब मैंने महसूस किया कि कोई भी पक्षी अपना घोंसला ये सोचकर नहीं बनाता है कि इसमें मेरे बच्चे रहेंगे फिर उसके बच्चे! वे जब कितनी जरूरत होती है कुदरत से सिर्फ उतना ही लेते हैं।
हमारी लालसा
पता नहीं हम इंसान उनकी जैसी सोच क्यूँ नहीं रख पाते हैं। हम महल बना लेते हैं ये सोचकर कि हमारी आने वाली पीढ़ी इसमें रहेगी। कुछ समय बाद हमारी आने वाली पीढ़ी उस महल को छोड़कर दूसरा महल बना लेती है और उसमें रहने लगती है। वह महल जो हमने इतने शौक से बनाया था एक दिन खंडहर हो जाता है।
क्या फायदा हुआ महल बनाकर ?? क्या हम पक्षियों की तरह जितनी जरूरत हो उतना ही बड़ा घर बनाये। हमारे बच्चों को जब जितनी उनकी जरूरत हो वो उतना बड़ा घर फिर बना लेंगे। पक्षी भी तो एसा ही करते हैं उनकी हर पीढ़ी अपने लिए एक नया घोंसला बनाती है और जब उस घोंसले की जरूरत नहीं रहती तो उसे छोड़कर चली जाते हैं। उसका मोह नहीं रखते हैं।
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हमारा लालच
पर हम इंसान एसा नहीं कर सकते हैं। हमें तो दुनिया भर की चीजें चाहिए भले ही उसके लिए हमें कुछ भी करना पड़े। भले ही उस वस्तु को हासिल करने के लिए हमें सामने वाले का गला ही क्यूँ ना काटना पड़े हम उसमें भी नहीं हिचकिचाते हैं।
हम कुदरत से इतना ही क्यूँ नहीं ले सकते हैं जितनी हमारी जरूरत हो। बाकी जीवों की तरह।
विचरणीय प्रश्न
पता नहीं हमारी सोच इतनी संकीर्ण कब से हो गयी कि हम अपने ही भाई बंधुओं के दुश्मन बन बैठे। और कुदरत का तो एसा हाल कर दिया कि प्रकृति अब दम तोड़ने लगी है। और जब प्रकृति अपना रास्ता खुद बनाने लगती है तो हम उसे कुदरत का तांडव और विनाश कहते हैं।
हममे ये कभी सोचा कि हम कुदरत का कितना विनाश कर रहे हैं। कुदरत तो सिर्फ अपना रास्ता माँग रही है। जिस पर हम क़ब्ज़ा करके बैठे हैं। अभी भी समय है हमें सचेत हो जाना चाहिए। वरना अगर कभी कुदरत सचेत हो गयी तो फिर ये घर महल सब यहीं धरे रह जाएंगे और हम कुछ नहीं कर पाएंगे।
विचार अवश्य कीजिएगा।
धन्यावाद 🙏
भावना भट्ट
स्वरचित और मौलिक रचना
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Agar Bhawana Bhatt ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:









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