वह अधूरी मुलाकात और खामोशियाँ
कुछ रिश्ते कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। वे बस बातचीत के बीच से निकलकर यादों में रहने लगते हैं।
1. एक मुलाकात, जिसने मुझे मुझसे ही अनजान कर दिया
कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी में कोई ऐसा भी आएगा, जिससे मिलने की ख्वाहिश दिल में उम्र भर रह जाएगी। कभी यह भी नहीं सोचा था कि किसी से मोहब्बत करना इतना खूबसूरत हो सकता है और उसी मोहब्बत को खो देना इतना दर्दनाक।
मुझे लगता था कि जिंदगी में सब कुछ समझना आसान होता है। दोस्ती क्या होती है, किसी की फिक्र करना क्या होता है, किसी को याद करना क्या होता है—इन सबके मतलब मुझे पता हैं। लेकिन फिर मेरी जिंदगी में एक ऐसा इंसान आया, जिसने मुझे मेरे ही दिल के सामने खड़ा कर दिया।
उसका नाम आरव था।
जब मैं पहली बार उससे मिली थी, तब मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह लड़का एक दिन मेरी जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा बन जाएगा कि उसके बिना सब कुछ होते हुए भी कुछ अधूरा लगेगा।
पहली मुलाकात में ही उसकी आंखों में कुछ ऐसा था, जिसे मैं आज तक शब्दों में नहीं समझा पाई। शायद कोई जादू नहीं था, शायद वह सिर्फ मेरा भ्रम था, लेकिन उसकी आंखों में देखकर ऐसा लगता था जैसे वहां कोई ऐसी दुनिया है, जिसके बारे में मुझे अभी कुछ नहीं पता।
मैं उससे मिली और फिर अपनी जिंदगी में लौट आई। लेकिन पता नहीं क्यों, मेरा मन वहीं रह गया।
उसकी बातें याद आने लगीं। उसका बोलने का तरीका, उसका हंसना, छोटी-छोटी बातों पर उसका परेशान हो जाना। कभी कोई काम करते हुए अचानक उसका ख्याल आ जाता, तो कभी रात को बिस्तर पर लेटते ही दिमाग में उसकी बातें घूमने लगतीं।
धीरे-धीरे हालत ऐसी हो गई कि पूरा दिन निकल जाता, लेकिन मेरे ख्यालों से वह नहीं निकलता था।
मैं खुद से पूछती, आखिर मुझे हो क्या रहा है?
मैं पहले तो ऐसी नहीं थी। किसी से बात करना, किसी की फिक्र करना और किसी को याद करना मेरी जिंदगी में कोई नई बात नहीं थी। फिर आरव के मामले में ऐसा क्या अलग था कि मैं खुद को समझा ही नहीं पा रही थी?
उस वक्त मुझे एक बात समझ नहीं आती थी—कभी-कभी कोई इंसान हमारी जिंदगी में धीरे-धीरे आता है, लेकिन हमारे दिल में उसकी जगह इतनी जल्दी बन जाती है कि हमें खुद पता नहीं चलता।
और शायद मेरे साथ भी यही हो रहा था।
2. दोस्तों का एक सवाल और मेरा झूठा इनकार
मेरे कुछ दोस्त थे, जिनसे मैं अपनी हर छोटी-बड़ी बात शेयर करती थी। एक दिन मैंने उनसे आरव के बारे में बात की। मैंने बताया कि कैसे उसका ख्याल मुझे बार-बार आता है, कैसे मैं उसकी बातों को याद करती रहती हूं और कैसे उसकी परेशानी देखकर मेरा मन भी बेचैन हो जाता है।
मेरी बात सुनकर उनमें से एक ने हंसते हुए कहा, “बहन, तुझे प्यार हो गया है।”
मैंने तुरंत जवाब दिया, “पागल है क्या? मुझे क्यों होगा प्यार? मैं कोई ऐसी लड़की नहीं हूं, जो किसी को देखकर प्यार में पड़ जाए।”
वह हंसने लगा।
“अच्छा! तो फिर तू उसकी इतनी फिक्र क्यों करती है?”
“फिक्र करने का मतलब प्यार होता है क्या? दोस्त है मेरा। दोस्त की फिक्र नहीं करूंगी तो किसकी करूंगी?”
दूसरे दोस्त ने भी मेरी बात में अपनी बात जोड़ दी।
“ठीक है, अभी दोस्ती बोल ले। देखते हैं कब तक इस बात को मानेगी।”
मुझे चैलेंज बहुत पसंद थे। किसी के सामने अपनी बात साबित करना मेरे लिए जैसे एक जिद बन जाता था। मैंने भी उसी अंदाज में कहा, “ठीक है, चैलेंज कर लो। मैं कभी नहीं मानूंगी कि मुझे उससे प्यार है।”
सब हंसने लगे।
उस वक्त मैं सच में यही मानती थी कि मैं उससे सिर्फ दोस्ती करती हूं। मुझे लगता था कि मैं अपने दिल को अच्छी तरह जानती हूं और अगर मुझे प्यार होगा, तो मुझे खुद पता चल जाएगा।
लेकिन दिल को समझना इतना आसान कहां होता है?
कभी-कभी हम जिस एहसास को दोस्ती का नाम देकर छिपाते रहते हैं, वही एहसास धीरे-धीरे हमारी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और सबसे मुश्किल हिस्सा बन जाता है।
आरव मेरे लिए खास हो चुका था, लेकिन मैं यह बात खुद से भी स्वीकार नहीं करना चाहती थी।
मुझे क्या पता था कि जिस प्यार से मैं इनकार कर रही थी, एक दिन उसी प्यार को पाने के लिए मेरा दिल सबसे ज्यादा बेचैन होगा।
3. वह रात, जब दोस्ती के बीच मोहब्बत ने दस्तक दी
एक रात आरव का फोन आया।
यह बात मुझे इसलिए याद है, क्योंकि वह आमतौर पर रात में मुझे इस तरह फोन नहीं करता था। मैंने कॉल उठाई, तो उसकी आवाज कुछ अलग लग रही थी।
“क्या कर रही हो?”
“कुछ नहीं। बोल, क्या हुआ?”
वह कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “तुमसे एक जरूरी बात करनी है।”
मैंने हंसते हुए कहा, “तो कर ना। इसमें इतनी गंभीर होने वाली क्या बात है?”
वह फिर चुप हो गया।
“पहले एक वादा करो।”
मैंने हैरान होकर पूछा, “अब क्या हो गया? कैसी बात करनी है तुझे?”
“वादा करो कि मेरी बात सुनने के बाद हमारी दोस्ती नहीं तोड़ोगी।”
उसकी बात सुनकर मैं थोड़ी गंभीर हो गई।
मैंने कहा, “आरव, ऐसी क्या बात है? तू मुझे डरा क्यों रहा है? साफ-साफ बोल ना।”
वह बार-बार एक ही बात कह रहा था कि पहले वादा करो। उसकी आवाज में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जैसे वह कुछ कहना तो चाहता था, लेकिन कहने से डर भी रहा था।
आखिरकार मैंने कहा, “ठीक है, वादा करती हूं। अब बता भी दे।”
उसने धीरे से कहा, “चाहे हमारे बीच कुछ भी हो जाए, हमारी दोस्ती कभी नहीं टूटनी चाहिए।”
मैंने जवाब दिया, “नहीं टूटेगी। अब बोल भी दे।”
और फिर उसने वह बात कह दी, जिसने मेरे दिल में पहले से चल रही हलचल को एक नया नाम दे दिया।
“मुझे तुमसे मोहब्बत हो गई है, मीरा। पहली बार किसी से इतनी मोहब्बत हुई है। और मैं चाहता हूं कि यह मेरी आखिरी मोहब्बत भी तुम ही रहो।”
मैं कुछ देर तक खामोश रही।
मुझे समझ नहीं आया कि क्या कहूं। जिस बात को मेरे दोस्त मजाक में कहते थे, वही बात आज आरव ने इतनी गंभीरता से कह दी थी।
मैंने घबराकर कहा, “पागल हो गया है क्या? ये क्या बोल रहा है? मजाक मत कर मेरे साथ।”
उसने कहा, “मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। मैं सच बोल रहा हूं। मुझे तुमसे प्यार है।”
मैंने फिर कहा, “आरव, सोच ले। हमारी दोस्ती बहुत अच्छी है। ऐसा कुछ हुआ और बाद में नहीं चला, तो क्या होगा?”
उसका जवाब आज भी याद है।
“मैं दोस्ती खत्म नहीं करना चाहता। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। लेकिन अपने दिल की बात तुमसे छिपाकर भी नहीं रख सकता।”
उस रात फोन पर सिर्फ उसकी आवाज थी और मेरे दिल में हजारों सवाल।
मैंने उससे वक्त मांगा।
उसने कहा, “जितना वक्त चाहिए, ले लो। मैं इंतजार कर लूंगा।”
उसे क्या पता था कि जिस जवाब का इंतजार वह कर रहा था, उसका जवाब मेरे दिल में भी कहीं पहले से मौजूद था। बस मैं उसे पहचान नहीं पा रही थी।
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4. प्यार क्या होता है, यह मुझे तब तक नहीं पता था
सच कहूं, तो मुझे आरव से लगाव हो चुका था। उसकी खुशी मेरी खुशी बन गई थी। वह परेशान होता, तो मेरा मन बेचैन हो जाता। उसकी आवाज में उदासी होती, तो मैं बार-बार पूछती कि क्या हुआ।
लेकिन क्या यह प्यार था?
मैं यही सोचती रहती थी।
मैंने फिल्मों में प्यार देखा था। लोगों को एक-दूसरे से आई लव यू कहते सुना था। मैंने प्रेम कहानियां पढ़ी थीं, लेकिन जब वही एहसास मेरी अपनी जिंदगी में आया, तो मुझे समझ नहीं आया कि इसका जवाब कैसे दूं।
क्या प्यार सिर्फ किसी को चाहने का नाम है?
क्या किसी को खोने से डरना प्यार है?
क्या किसी की खुशी के लिए अपनी खुशी भूल जाना प्यार है?
या फिर प्यार वह होता है, जिसमें किसी एक इंसान की आवाज सुनकर पूरी दुनिया की थकान उतर जाती है?
मेरे पास इन सवालों के जवाब नहीं थे।
तीन दिन तक मैं सोचती रही। आरव से बातें होती रहीं, लेकिन मेरे मन में एक अलग ही लड़ाई चल रही थी।
वह मुझसे जवाब मांगता, तो मैं बात बदल देती।
एक दिन उसने कहा, “मीरा, तुमने कुछ सोचा?”
मैंने कहा, “हां, सोचा है।”
वह तुरंत बोला, “तो बता ना।”
मैं कुछ कहती, उससे पहले उसने पूछा, “तुमने खाना खाया?”
मैंने कहा, “नहीं।”
वह चुप हो गया। फिर बोला, “तुम खाना खा लो, उसके बाद बात करते हैं।”
मैंने हंसते हुए कहा, “अरे, पहले मेरा जवाब तो सुन!”
वह बोला, “तुमने दो-तीन दिन से ठीक से खाना नहीं खाया। पहले खाना खाओ।”
मैंने उससे पूछा, “तुझे कैसे पता कि मैंने खाना नहीं खाया?”
उसने कहा, “तुम्हारी आवाज से समझ आ जाता है। और जब तुम परेशान होती हो ना, तो अपने खाने तक का ध्यान नहीं रखती।”
फिर उसने एक ऐसी बात कही, जिसे सुनकर मेरा दिल भर आया।
“तुम खाओगी, तभी मैं भी खाऊंगा।”
मैंने उसे डांटते हुए कहा, “आरव, पागल मत बन। जाकर खाना खा ले।”
वह अपनी बात पर अड़ा रहा।
उस पल मुझे पहली बार समझ आया कि किसी की फिक्र करना केवल उसकी बातें सुनना नहीं होता। कभी-कभी सामने वाला हमारी छोटी-सी आदत तक याद रखता है, हमारे चेहरे की उदासी पहचान लेता है और हमारे ठीक होने को अपनी खुशी से जोड़ लेता है।
मैं अक्सर उसकी मुस्कान देखकर खुश हो जाती थी। वह खुद भी कहता था कि मैं कम मुस्कुराती हूं। शायद हम दोनों की जिंदगी में खुशियों की अपनी-अपनी कमी थी, लेकिन जब हम बात करते थे, तो एक-दूसरे के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश जरूर करते थे।
मैं उससे कहती थी, “तेरी खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं।”
उस वक्त मुझे नहीं पता था कि एक दिन यही इंसान मेरी जिंदगी में ऐसी यादें छोड़ जाएगा, जिन्हें याद करके मैं मुस्कुराने और रोने के बीच अटक जाऊंगी।
5. मेरा जवाब और हमारी मोहब्बत की शुरुआत
आखिरकार मैंने आरव से कहा, “तुझे मेरा जवाब सुनना है?”
उसकी आवाज में तुरंत उत्साह आ गया।
“हां, जल्दी बता।”
लेकिन अगले ही पल उसने कहा, “पहले खाना खा लो।”
मैं हंस पड़ी।
“अरे, खाना खा लिया! अब जवाब सुन।”
वह बोला, “हां, बोलो।”
मैंने कुछ पल रुककर कहा, “मुझे नहीं पता कि प्यार कैसे होता है। मुझे नहीं पता कि मैं इसे पूरी तरह समझती भी हूं या नहीं। लेकिन इतना पता है कि तू मेरे लिए बहुत खास है। तेरी फिक्र होती है। तुझसे बात किए बिना अच्छा नहीं लगता। और अगर यही प्यार है, तो शायद मुझे भी तुझसे प्यार है।”
कुछ पल के लिए दूसरी तरफ खामोशी छा गई।
फिर उसकी आवाज आई, “सच में?”
मैंने कहा, “नहीं, मजाक कर रही हूं!”
वह हंस पड़ा।
उसकी हंसी सुनकर मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई। उस दिन मुझे लगा कि शायद जिंदगी में पहली बार मैंने किसी को अपने दिल के इतने करीब आने दिया है।
लेकिन मेरी एक शर्त थी।
मैंने उससे कहा, “आरव, मुझे एक बात चाहिए। तुम सिगरेट पीते हो, शराब पीते हो और दूसरी ऐसी चीजें भी लेते हो, जिनसे मुझे नफरत है। अगर हम इस रिश्ते में आगे बढ़ते हैं, तो तुम्हें इन्हें छोड़ने की कोशिश करनी होगी।”
वह कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला, “मैं पूरी कोशिश करूंगा। तुम्हारे लिए छोड़ना चाहता हूं। लेकिन मैं अभी यह वादा नहीं कर सकता कि एक दिन में सब छोड़ दूंगा।”
मैंने कहा, “मुझे झूठा वादा नहीं चाहिए। बस कोशिश सच्ची होनी चाहिए।”
उसने कहा, “ठीक है, मीरा। कोशिश करूंगा।”
और उस दिन से हम दोस्त नहीं रहे, ऐसा नहीं था। हम दोस्त भी थे और एक-दूसरे से मोहब्बत करने वाले दो लोग भी।
कभी-कभी मैं सोचती थी कि कितनी अजीब बात है। जिस इंसान के लिए कभी मैं अपने दोस्तों से बहस करती थी कि मुझे प्यार नहीं हो सकता, आज उसी के एक फोन का इंतजार करती हूं।
और सबसे अजीब बात यह थी कि कभी मैं मजाक में कहा करती थी कि जिस लड़की से आरव की शादी होगी, वह बहुत किस्मत वाली होगी।
मुझे क्या पता था कि एक दिन मैं खुद को उसकी होने वाली पत्नी के रूप में सोचने लगूंगी।
मुझे नहीं पता था कि किस्मत मेरे लिए क्या लिख रही थी। उस वक्त तो बस इतना पता था कि मुझे उससे प्यार हो गया है।
और प्यार में पड़े इंसान को अक्सर आने वाले कल की चिंता नहीं होती। उसे लगता है कि आज जो हाथ थामा है, वह हमेशा उसके साथ रहेगा।
मैंने भी यही सोचा था।
6. रातें छोटी थीं और बातें खत्म नहीं होती थीं
हमारी मोहब्बत के शुरुआती दिन किसी खूबसूरत सपने जैसे थे।
फोन पर बातें शुरू होतीं, तो समय का पता ही नहीं चलता था। कभी रात के दो बज जाते, कभी सुबह के चार। हम एक-दूसरे से हर छोटी-बड़ी बात शेयर करते थे।
कॉलेज में होती, तो उसका ख्याल आता। घर पहुंचती, तो सबसे पहले उससे बात करने का मन करता। कभी फोन पर बात न हो पाती, तो लगता जैसे दिन का कोई जरूरी हिस्सा छूट गया हो।
हमारे बीच तू-तड़ाक वाली भाषा थी। हम एक-दूसरे को आप कहकर बात नहीं करते थे। हमारी दोस्ती की वही पुरानी सहजता थी, बस अब उसमें मोहब्बत भी शामिल हो चुकी थी।
वह मुझे चिढ़ाता, मैं उसे डांटती। वह हंसता, तो मैं भी हंस पड़ती। कभी छोटी-सी बात पर बहस हो जाती, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर फोन आ जाता।
उस समय मुझे लगता था कि रिश्ते ऐसे ही होते हैं। लड़ाई भी होगी, प्यार भी होगा, नाराजगी भी होगी और मनाना भी होगा।
हम दोनों बहुत लड़ते थे। कभी मेरी गलती होती, कभी उसकी। लेकिन उन दिनों हमारे बीच अलग होने का ख्याल तक नहीं आता था।
मुझे लगता था कि हम चाहे कितना भी लड़ लें, आखिर में एक-दूसरे के पास लौट ही आएंगे।
शायद यही भरोसा धीरे-धीरे मेरी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया।
क्योंकि जब हमें किसी की आदत पड़ जाती है, तो हम उसके साथ होने को सामान्य समझने लगते हैं। हमें लगता है कि वह हमेशा रहेगा। उसकी आवाज हमेशा सुनाई देगी। उसका फोन हमेशा आएगा। और अगर कभी वह नाराज भी हो गया, तो थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा।
मैं भी इसी भरोसे में जी रही थी।
लेकिन वक्त बदलता है, इंसान बदलते हैं और कभी-कभी रिश्ते भी अपनी पुरानी जगह पर नहीं रहते।
शुरुआत में जिस इंसान के पास हमारे लिए वक्त ही वक्त होता है, एक दिन उसी से हमें कुछ मिनट मांगने पड़ते हैं।
और तब समझ आता है कि प्यार की शुरुआत में मिलने वाला समय और प्यार को निभाने के लिए निकाला जाने वाला समय, दोनों में बहुत फर्क होता है।
7. उसकी छोटी-छोटी बातें मेरी दुनिया थीं
आरव की कुछ आदतें थीं, जो आज भी मुझे याद हैं।
उसे खाने में ज्यादा मिर्च पसंद नहीं थी। मैं कभी उसके खाने में मिर्च डाल देती, तो वह शिकायत करता, “मीरा, कितनी बार कहा है कि खाने में मिर्च मत डाला कर!”
मैं हंसकर कहती, “अच्छा, अब नहीं डालूंगी।”
और फिर कभी मौका मिलता, तो उसकी थाली में अपने खाने में से थोड़ा डाल देती।
वह मुझे देखकर कहता, “तू एक दिन अपने हाथों से मुझे जहर खिला देगी।”
मैं हंसते हुए जवाब देती, “इतना प्यार करती हूं तुझसे, फिर भी जहर खिला दूंगी?”
वह तुरंत कहता, “तेरे हाथों से जहर भी खा सकता हूं, बस मिर्च मत खिलाया कर।”
उसकी ये बातें सुनकर मैं हंसते-हंसते दोहरी हो जाती थी।
हमारी दुनिया में ऐसी ही छोटी-छोटी बातें थीं। कोई बड़ी फिल्मी मुलाकात नहीं, कोई महंगे तोहफे नहीं। बस फोन पर बातें, एक-दूसरे को छेड़ना, नाराज होना, मनाना और दिनभर की परेशानियों को बांटना।
वह मेरे थोड़ी देर से फोन उठाने पर नाराज हो जाता था। अगर मैं दस मिनट लेट हो जाती, तो पूछता, “कहां थी? फोन क्यों नहीं उठाया?”
और मैं उसे समझाती रहती कि कोई काम था, इसलिए देर हो गई।
उस वक्त मुझे उसकी नाराजगी में भी प्यार दिखाई देता था।
मुझे अच्छा लगता था कि कोई मेरी इतनी फिक्र करता है। कोई मेरी आवाज सुनकर पहचान लेता है कि मैं ठीक हूं या नहीं। कोई मेरे दुख को अपना दुख समझता है।
एक बार मैं बहुत भावुक होकर रो रही थी। उसने मुझे रोते हुए सुना, तो बेचैन हो गया।
“पागल है क्या? क्यों रो रही है? मुझे भी रुलाएगी क्या? तेरी आंखों में आंसू देखता हूं, तो मुझसे भी रहा नहीं जाता।”
उसने मुझे चुप कराने की बहुत कोशिश की।
उस वक्त मुझे लगता था कि मेरी आंखों में आंसू आने से जिस इंसान का दिल दुखता है, वह मुझे कभी जानबूझकर इतना दुख नहीं देगा कि मेरी आंखों से आंसू रुकने का नाम ही न लें।
मैंने उसकी आंखों में अपने लिए प्यार देखा था। उसकी बातों में भरोसा महसूस किया था।
मैंने उसकी कही हर बात को सच माना था।
और शायद प्यार में सबसे खूबसूरत चीज यही होती है कि हम किसी पर भरोसा करने से पहले हजार बार नहीं सोचते।
लेकिन सबसे ज्यादा दर्द भी तब होता है, जब वही भरोसा धीरे-धीरे टूटने लगता है।
8. चार साल का साथ और बदलती हुई आदतें
हमारे रिश्ते को वक्त बीतता गया।
एक साल हुआ, फिर दूसरा। हमने अच्छे दिन भी देखे और बुरे दिन भी। कभी इतनी मोहब्बत होती कि लगता था दुनिया में हमसे ज्यादा खुश कोई नहीं। कभी छोटी-छोटी बातों पर ऐसी लड़ाई होती कि लगता था अब बात नहीं करेंगे।
लेकिन आखिर में बात हो ही जाती थी।
हमारे रिश्ते में करीब चार साल का साथ था। इन चार सालों में हमने एक-दूसरे को अपने गुस्से में भी देखा, अपनी कमजोरी में भी और अपनी खुशियों में भी।
वह गुस्से में बहुत कुछ बोल जाता था, लेकिन उसने कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया। मैं इस बात को याद करती हूं, लेकिन आज समझती हूं कि किसी रिश्ते में हाथ न उठाना जरूरी है, कोई एहसान नहीं। इज्जत और सुरक्षा हर रिश्ते का बुनियादी हिस्सा होती हैं।
उस वक्त मैं इन सब बातों को इतने साफ तरीके से नहीं समझती थी। मैं बस इतना जानती थी कि आरव मेरा अपना है और मुझे उसके साथ रहना है।
लेकिन एक चीज थी, जो हमारे बीच धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी—उसकी शराब पीने की आदत।
शुरुआत में भी वह शराब पीता था। मुझे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी। मैंने उसे पहले दिन से कहा था कि मुझे ऐसी आदतों से नफरत है।
फिर भी जब वह मेरे करीब आया, तो मैंने सोचा कि शायद मेरा प्यार उसे बदल देगा।
मैं उससे बार-बार कहती, “आरव, मत किया कर ये सब। मुझे अच्छा नहीं लगता। जब तू नशे में होता है, तो तुझे खुद नहीं पता होता कि तू क्या बोल रहा है।”
वह कहता, “ठीक है, कोशिश करूंगा।”
कभी-कभी वह नशे में फोन करता और ऐसी बातें कह जाता, जो मुझे बहुत दुख देती थीं। लेकिन अगले दिन होश में आने पर माफी मांग लेता।
“कल जो बोला, उसके लिए सॉरी। मुझे ऐसा नहीं बोलना चाहिए था।”
मैं उसकी माफी सुनकर फिर पिघल जाती।
मुझे लगता कि उसे अपनी गलती का एहसास है, वह एक दिन बदल जाएगा।
मैंने कई बार उसकी चीजें छिपाईं, उसे रोकने की कोशिश की और समझाया कि मुझे उसकी सेहत की भी चिंता है। कभी वह मेरी बात मान लेता, कभी हंसकर टाल देता।
वह मुझसे कहता था कि मैं ही उसकी चीजें छीनकर रख देती हूं।
बाद में, जब कभी हमारी बात होती, तो वह कहता, “यार, तू ही एक थी जो मेरे हाथ से सब छीन लेती थी। मुझे रोकती थी। अब कभी-कभी खुद ही मन नहीं करता इन चीजों को लेने का।”
उसकी ये बातें सुनकर मेरे मन में एक अजीब-सी खुशी होती थी। लगता था कि शायद मेरी कोशिशें बेकार नहीं गईं।
लेकिन किसी इंसान को बदलना सिर्फ प्यार करने वाले के चाहने से नहीं होता। बदलाव की इच्छा उस इंसान के भीतर भी होनी चाहिए।
यह बात मुझे बहुत देर से समझ आई।
मैंने उसके लिए बहुत कुछ सहा। कई बार ऐसी बातें भी नजरअंदाज कीं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए था। मैं उसके नशे में होने पर भी उससे बात करती रही, उसे संभालती रही और अपने दुख को पीछे रखती रही।
मैं यह भूल गई थी कि किसी से प्यार करने का मतलब यह नहीं कि हम अपनी तकलीफ को हमेशा अनदेखा करते रहें।
मुझे उससे प्यार था, इसलिए मैं उसे खोना नहीं चाहती थी।
और इसी डर में शायद मैं धीरे-धीरे खुद को खोती जा रही थी।
9. एक दिन आया, जब मैंने सोचा कि अब वह मुझे मनाएगा
हमेशा की तरह हमारे बीच फिर एक लड़ाई हुई।
ऐसा नहीं था कि हमारी पहली लड़ाई थी। हम पहले भी कई बार नाराज हुए थे। कई बार फोन काटा था, कई बार एक-दूसरे को जवाब नहीं दिया था और कई बार थोड़ी देर बाद खुद ही बात करने लगे थे।
मुझे आदत थी कि अगर आरव नाराज होता, तो मैं उसे मनाने की कोशिश करती। मैं फोन करती, समझाती, कभी अपनी गलती मान लेती और कभी उसकी गलती होने पर भी बात खत्म करने के लिए आगे बढ़ जाती।
मुझे लगता था कि रिश्ते में किसी एक को तो पहल करनी पड़ती है।
लेकिन उस दिन मेरे मन में कुछ अलग आया।
मैंने सोचा, हर बार मैं ही क्यों?
क्या उसे कभी मेरी कमी महसूस नहीं होती? क्या उसे कभी यह ख्याल नहीं आता कि मैं भी नाराज हो सकती हूं? क्या वह कभी खुद से मुझे मनाने नहीं आ सकता?
मैंने तय किया कि इस बार मैं फोन नहीं करूंगी।
मैं इंतजार करूंगी।
मुझे यकीन था कि आरव मुझे मनाने आएगा। आखिर इतने साल का साथ था। इतने सारे वादे थे। इतनी सारी यादें थीं। क्या वह सब कुछ इतनी आसानी से भूल सकता था?
उस दिन हमारी फोन पर कुछ सेकंड ही बात हुई होगी। शायद दो मिनट भी पूरे नहीं हुए थे।
लेकिन उन चंद पलों में उसने कुछ ऐसी बातें कह दीं, जिन्होंने मेरे भीतर बहुत कुछ तोड़ दिया।
उसके शब्द मेरे दिल में उतरते चले गए।
मैंने उस दिन कोई लंबी बहस नहीं की। न उसे बार-बार समझाया, न अपनी बात साबित करने की कोशिश की।
बस खामोश हो गई।
मैंने उससे कहा, “ठीक है। आज के बाद मैं तुझे फोन नहीं करूंगी।”
शायद उसे लगा होगा कि मैं गुस्से में ऐसा बोल रही हूं। शायद उसे लगा होगा कि कुछ समय बाद मैं खुद ही फोन कर लूंगी, जैसे हमेशा करती आई थी।
लेकिन उस दिन मेरे भीतर कुछ बदल चुका था।
मैंने फोन रख दिया।
और फिर मैंने इंतजार किया।
एक घंटे तक।
फिर शाम तक।
फिर रात तक।
हर बार फोन की स्क्रीन जलती, तो मेरा दिल एक पल के लिए धड़क उठता। मैं सोचती, शायद आरव होगा। शायद उसे अपनी बात का एहसास हो गया होगा। शायद वह पूछेगा कि मैं इतनी चुप क्यों हूं।
लेकिन फोन पर उसका नाम नहीं आया।
न कोई कॉल।
न कोई मैसेज।
न कोई सवाल कि मीरा, क्या हुआ?
उस रात मैंने खुद को बहुत समझाया।
मैंने सोचा, शायद वह व्यस्त होगा। शायद उसका गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ। शायद सुबह तक बात कर लेगा।
मैंने खुद को उम्मीद दी, क्योंकि उम्मीद के बिना उस वक्त मेरे पास कुछ था ही नहीं।
लेकिन सुबह हुई और फोन फिर भी खामोश रहा।
10. वह आठ बजे, जो आज भी याद है
आरव की एक आदत थी।
वह रात को जल्दी सो जाता था। आमतौर पर आठ बजे के आसपास वह मुझे फोन कर लेता था। कभी बातें लंबी चलतीं, कभी वह जल्दी सो जाता, लेकिन उस समय के आसपास उसका फोन आना मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया था।
मुझे उसकी टाइमिंग तक याद हो गई थी।
कई बार मैं अपने काम में लगी होती, लेकिन मन में पता होता कि अब उसका फोन आने वाला होगा।
आठ बजते ही दिल फोन की तरफ देखने लगता।
कभी फोन की घंटी बजती, तो चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ जाती। कभी वह फोन करके पूछता, “क्या कर रही है?” और मैं ऐसे जवाब देती, जैसे दिनभर उसी का इंतजार नहीं कर रही थी।
लेकिन जिस दिन हमारे बीच खामोशी आई, उसी आठ बजे ने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया।
समय हुआ आठ बजे का।
मैंने फोन देखा।
कोई कॉल नहीं।
मैंने खुद को समझाया कि आज शायद देर हो गई होगी।
नौ बजे फोन देखा।
कुछ नहीं।
दस बजे फिर देखा।
कुछ नहीं।
रात बीतती रही। मेरा मन बार-बार फोन की तरफ जाता रहा। मैं चाहती थी कि एक बार उसका फोन आ जाए। वह कुछ न भी बोले, बस इतना पूछ ले कि मैं ठीक हूं या नहीं।
मैं शायद उस दिन भी उसे माफ कर देती।
क्योंकि जब दिल किसी को बहुत चाहता है, तो कभी-कभी वह अपने ही दुख से ज्यादा उस इंसान के लौट आने को जरूरी समझने लगता है।
लेकिन वह नहीं आया।
अगले दिन भी नहीं।
मैं इंतजार करती रही।
दिन गुजरने लगे, फिर हफ्ते। मेरे भीतर एक सवाल लगातार उठता रहा—क्या उसे सच में मेरी याद नहीं आती? क्या चार साल का साथ उसके लिए इतना मामूली था कि वह एक फोन किए बिना आगे बढ़ गया?
मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि हम दोनों के बीच कोई ऐसी आखिरी लड़ाई भी नहीं हुई थी, जिसमें सब कुछ खत्म हो जाने की बात साफ-साफ कही गई हो।
न कोई ठीक से विदाई हुई।
न कोई आखिरी मुलाकात।
न कोई ऐसा पल, जब हमने आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे से पूछा हो कि आखिर हम यहां तक कैसे पहुंचे।
बस एक दिन बातें बंद हो गईं।
और फिर उस खामोशी ने हमारे रिश्ते की जगह ले ली।
11. वह आखिरी बातचीत, जिसका जवाब आज तक नहीं मिला
कई बार मैं सोचती हूं कि काश उस दिन मैं उससे लड़ लेती।
काश मैं उससे पूछती कि आखिर उसने ऐसा क्यों कहा।
काश मैं रोकर अपना सारा दुख उसके सामने रख देती।
शायद वह मुझे समझाता। शायद मैं उसे समझाती। शायद हम दोनों को एहसास हो जाता कि हम एक-दूसरे से कितना प्यार करते हैं।
या शायद सब कुछ फिर भी खत्म हो जाता।
मैं यह नहीं कह सकती कि अगर उस दिन हमने बात की होती, तो हमारा रिश्ता बच जाता। जिंदगी में हर सवाल का जवाब हमारे पास नहीं होता।
लेकिन एक बात जरूर है—अगर रिश्ते का अंत सामने बैठकर होता, तो शायद उसे स्वीकार करना थोड़ा आसान होता।
कम से कम मुझे यह तो पता होता कि आखिरी बार उसकी आंखों में देखकर क्या महसूस हुआ था।
कम से कम मैं यह तो जान पाती कि उसकी आवाज में मेरे लिए कुछ बाकी था या नहीं।
लेकिन हमारी कहानी में ऐसा कुछ नहीं हुआ।
हम मिले ही नहीं।
हमारा रिश्ता खत्म हुआ, लेकिन कोई आखिरी मुलाकात नहीं हुई।
कभी-कभी मुझे लगता है कि जिंदगी में अधूरे रिश्तों का सबसे बड़ा दर्द यही होता है कि हमारे पास याद करने के लिए बहुत कुछ होता है, लेकिन अंत के नाम पर कुछ भी नहीं।
हम अपने मन में बार-बार वह आखिरी दृश्य बनाते रहते हैं, जो असल जिंदगी में कभी हुआ ही नहीं।
मैंने भी कई बार सोचा कि अगर हम सामने होते, तो क्या होता?
क्या मैं उसे देखकर रो पड़ती?
क्या वह मुझे देखकर चुप हो जाता?
क्या वह मुझे मना लेता?
क्या मैं उसकी एक बात पर फिर से सब कुछ भूल जाती?
मुझे नहीं पता।
मुझे सिर्फ इतना पता है कि उस दिन के बाद मैंने उससे दोबारा फोन नहीं किया।
मैंने अपने गुस्से में कहा था कि अब उसकी शक्ल भी नहीं देखूंगी।
उस वक्त मुझे नहीं पता था कि मेरी कही हुई बात इतनी लंबी हो जाएगी कि साल गुजर जाएंगे और मैं सच में उसे देख नहीं पाऊंगी।
कभी-कभी किस्मत हमारी बातों को भी कितनी अजीब तरह से सच कर देती है।
12. कई महीने पहले आखिरी मुलाकात की उम्मीद थी
हमारी आखिरी खामोशी से कुछ महीने पहले ही हमारी मुलाकात हुई थी। उसके बाद तो जैसे वक्त ने हमें अलग-अलग रास्तों पर डाल दिया।
लेकिन सच यह भी है कि उस आखिरी मुलाकात के बाद हम बहुत लंबे समय तक एक-दूसरे को देख नहीं पाए थे। हमारे बीच मिलने की चाहत तो थी, लेकिन हर चाहत पूरी हो जाए, ऐसा जरूरी नहीं होता।
एक समय था, जब हम दोनों मिलने के लिए बेचैन रहते थे।
बातों में अक्सर मिलने का जिक्र आता। हम सोचते कि जब सामने होंगे, तो क्या बातें करेंगे। एक-दूसरे को देखकर कैसे मुस्कुराएंगे। कितनी शिकायतें होंगी, कितनी हंसी होगी और कितना वक्त साथ बिताएंगे।
हमारी मुलाकातें कम थीं, लेकिन मिलने के सपने बहुत थे।
और फिर एक समय ऐसा आया कि हमारे पास एक-दूसरे से कहने के लिए बहुत कुछ था, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था।
मैं कभी-कभी सोचती हूं कि जिन दो लोगों ने एक-दूसरे से घंटों बात की हो, वे एक दिन ऐसे अनजान कैसे बन जाते हैं कि एक-दूसरे की जिंदगी में क्या चल रहा है, यह भी नहीं जानते?
जिसकी छोटी-सी परेशानी हमें परेशान कर देती थी, एक दिन उसकी पूरी जिंदगी हमारे लिए अनजान हो जाती है।
जिसकी आवाज सुने बिना नींद नहीं आती थी, एक दिन उसकी आवाज सुनने की उम्मीद भी छोड़नी पड़ती है।
और जिस इंसान के साथ हमने अपने आने वाले कल की कल्पना की थी, एक दिन पता चलता है कि वह अपना आज किसी और के साथ जी रहा है।
शायद यही जिंदगी है।
लेकिन जिंदगी होना और उस जिंदगी को स्वीकार कर लेना, दोनों अलग बातें हैं।
मैंने उसे भुलाने की कोशिश की, लेकिन भुलाना और आगे बढ़ना एक ही बात नहीं होती।
मैंने आगे बढ़ना सीखा।
भूलना आज भी नहीं आया।
13. जब कभी-कभी फिर बात हो जाती थी
समय बीतने के बाद कभी-कभी हमारी बात हो जाती थी।
बहुत ज्यादा नहीं, लेकिन इतनी कि पुराने दिनों की याद फिर से ताजा हो जाए।
कभी आरव अपनी आदतों की बात करता। कभी कहता कि उसने कुछ चीजें कम कर दी हैं। कभी अपनी जिंदगी की कोई छोटी-सी बात बता देता।
एक बार उसने कहा, “मीरा, तू ही एक थी जो मेरे हाथ से चीजें छीन लेती थी। मुझे रोकती थी। अब तो कभी-कभी खुद ही मन नहीं करता।”
मैं उसकी बात सुनकर चुप हो गई।
मेरे मन में एक साथ बहुत सारी यादें आ गईं।
मुझे वह समय याद आया, जब मैं उसे समझाती थी। जब उसकी चिंता में परेशान हो जाती थी। जब मैं चाहती थी कि वह अपनी सेहत का ध्यान रखे और उन चीजों से दूर रहे, जो उसे नुकसान पहुंचा सकती थीं।
मैंने उससे कहा, “मैंने तुझे बहुत समझाया था।”
वह बोला, “पता है।”
बस दो शब्द थे।
लेकिन उन दो शब्दों में मेरे लिए बीते हुए कई साल थे।
कभी-कभी वह पुरानी बातों का जिक्र करता, तो लगता था कि शायद उसे भी कुछ याद है। शायद वह भी उन दिनों को पूरी तरह नहीं भूला।
लेकिन याद करना और रिश्ते में वापस लौटना दो अलग बातें हैं।
किसी को हमारी याद आ सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हमारे साथ जिंदगी बिताना चाहता है।
किसी को अपनी गलती का एहसास हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हर गलती सुधारने के लिए वापस आएगा।
यह बात मैंने धीरे-धीरे सीखी।
मैं उसकी आवाज में पुराना आरव खोजती रही। वह लड़का, जो मेरे रोने पर परेशान हो जाता था। जो मेरी छोटी-सी नाराजगी को भी गंभीरता से लेता था। जो कहता था कि मुझे कभी खोना नहीं चाहता।
कभी-कभी उसकी बातों में उस पुराने लड़के की झलक मिलती थी।
लेकिन वह झलक कुछ पल की होती थी।
फिर जिंदगी अपनी जगह लौट आती थी।
और मैं अपनी जगह।
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14. दोस्ती खोई, तो समझ आया कि प्यार के साथ क्या चला गया
हमारे रिश्ते की शुरुआत दोस्ती से हुई थी।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि दोस्ती को प्यार में बदलने की कीमत इतनी बड़ी हो सकती है।
जब हम दोस्त थे, तब हमारे बीच एक अलग ही अपनापन था। मैं उससे बिना किसी डर के कुछ भी कह सकती थी। हम एक-दूसरे को समझते थे, एक-दूसरे की आदतों को जानते थे और छोटी-छोटी बातों पर हंस सकते थे।
फिर मोहब्बत हुई।
शुरुआत में लगा कि हमें दोस्ती के साथ प्यार भी मिल गया है। क्या इससे खूबसूरत बात कुछ हो सकती है?
लेकिन जब प्यार खत्म हुआ, तो सिर्फ प्यार नहीं गया।
दोस्ती भी चली गई।
वह इंसान, जिससे मैं अपनी हर बात कह सकती थी, अब वह इंसान नहीं रहा, जिसे मैं फोन करके अपना दिन बता सकूं।
वह नाम, जिसे देखकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी, अब कई बार दिल में अजीब-सी बेचैनी पैदा कर देता था।
मैं उससे नाराज भी थी, दुखी भी थी और उसके लिए मेरे मन में जो प्यार था, वह भी एकदम से खत्म नहीं हुआ था।
यही सबसे मुश्किल था।
अगर मैं उससे नफरत कर पाती, तो शायद आगे बढ़ना आसान होता।
अगर मुझे उससे कोई लगाव न होता, तो शायद उसकी यादें इतनी परेशान न करतीं।
लेकिन मैं उसे प्यार भी करती थी और उसके किए से दुखी भी थी।
मैं उसकी अच्छी बातें याद करती, तो बुरा वक्त पीछे छूट जाता। फिर जब बुरी बातें याद आतीं, तो मन में सवाल उठता कि क्या वही इंसान था, जो कभी मेरे लिए इतना परेशान हुआ करता था?
क्या लोग सच में बदल जाते हैं?
या वक्त के साथ उनके भीतर की वे बातें सामने आने लगती हैं, जिन्हें हम प्यार में रहते हुए देखना नहीं चाहते?
मुझे इसका पूरा जवाब आज भी नहीं पता।
लेकिन इतना समझ गई हूं कि किसी की अच्छी यादें होने का मतलब यह नहीं कि उसके साथ बिताया हर बुरा पल भी हमें स्वीकार करना चाहिए।
मैं आरव के अच्छे होने को नकार नहीं सकती थी।
लेकिन उसके कारण मिले दुख को भी हमेशा झुठला नहीं सकती थी।
दोनों बातें सच थीं।
वह कभी मेरे लिए बहुत खास था।
और उसी रिश्ते ने मुझे बहुत दुख भी दिया।
15. उसकी जिंदगी में अब कोई और है
वक्त के साथ जिंदगी आगे बढ़ती गई।
आरव की जिंदगी में भी बदलाव आए। आज उसका अपना परिवार है। उसकी पत्नी है। उसकी अपनी दुनिया है, जिसमें वह अपनी जिम्मेदारियों और रिश्तों के साथ जिंदगी जी रहा है।
कभी मैंने मजाक में कहा था कि उससे शादी करने वाली लड़की बहुत किस्मत वाली होगी।
आज जब उसके जीवन में कोई और है, तो उस पुरानी बात का ख्याल आता है।
मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाएगा और मैं दूर बैठकर उन दिनों को याद करूंगी, जब हम एक-दूसरे से घंटों बातें किया करते थे।
मैं उसके वर्तमान के बारे में सब कुछ नहीं जानती। मुझे यह भी नहीं पता कि उसकी जिंदगी कैसी है, वह कितना खुश है या उसकी रोजमर्रा की दुनिया में क्या चलता है।
और शायद अब यह जानना मेरी जिम्मेदारी भी नहीं है।
उसकी जिंदगी उसकी है।
उसके रिश्ते उसकी जिम्मेदारी हैं।
और मेरी जिंदगी मेरी है।
यह स्वीकार करने में वक्त लगा कि किसी इंसान से कभी बहुत प्यार करने का मतलब यह नहीं कि हम हमेशा उसकी जिंदगी का हिस्सा बने रहेंगे।
कुछ लोग हमारी जिंदगी में आते हैं, हमें बदलते हैं और फिर किसी ऐसे मोड़ पर चले जाते हैं, जहां से उन्हें वापस लाना हमारे हाथ में नहीं होता।
हम उनके साथ बिताए समय को मिटा नहीं सकते, लेकिन उस समय को अपनी पूरी जिंदगी पर हावी होने से रोकना सीख सकते हैं।
मैंने भी यही सीखा।
मैं आज भी उन दिनों को याद कर सकती हूं, लेकिन अब मैं यह उम्मीद नहीं करती कि वह लौटकर आएगा और सब कुछ पहले जैसा कर देगा।
क्योंकि कुछ रिश्तों में लौटने का रास्ता होता भी है, तो जरूरी नहीं कि लौटने के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाए।
कभी-कभी इंसान लौट भी आए, तो बीता हुआ वक्त वापस नहीं आता।
और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके लिए सबसे अच्छा अंत शायद यही होता है कि हम उन्हें उनकी जगह पर छोड़ दें।
यादों में।
16. शराब से नफरत करने वाली लड़की और उसका अपना प्यार
मेरे लिए शराब हमेशा से ऐसी चीज थी, जिससे मैं दूर रहना चाहती थी।
मुझे पसंद नहीं था कि कोई नशे में खुद को भूल जाए, अपनी बातों पर काबू न रख पाए और फिर अगले दिन सब कुछ माफी मांगकर ठीक करने की कोशिश करे।
लेकिन जब मुझे आरव से प्यार हुआ, तो मेरी सोच और मेरी भावनाओं के बीच एक लड़ाई शुरू हो गई।
मैंने उसे नशे में भी सहा।
उसकी आवाज में बदलाव सुना।
कभी उसकी बातें समझने की कोशिश की, कभी उसकी नाराजगी को नजरअंदाज किया और कभी अगले दिन उसकी माफी सुनकर अपने दिल को फिर समझा लिया।
मैंने यह सब इसलिए किया, क्योंकि मैं उससे प्यार करती थी।
मुझे लगता था कि अगर मैं उसे छोड़ दूंगी, तो वह और बिगड़ जाएगा। अगर मैं उसकी फिक्र करना बंद कर दूंगी, तो उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा।
लेकिन एक दिन मुझे यह समझना पड़ा कि किसी की आदतों की पूरी जिम्मेदारी हम अपने कंधों पर नहीं उठा सकते।
हम किसी को समझा सकते हैं।
उसकी मदद कर सकते हैं।
उसका साथ दे सकते हैं।
लेकिन उसके बदले अपनी मानसिक शांति, अपना आत्मसम्मान और अपना जीवन लगातार दांव पर नहीं लगा सकते।
यह बात समझने में मुझे बहुत वक्त लगा।
आज भी जब मैं उन दिनों को याद करती हूं, तो खुद पर हैरानी होती है।
मैं वही लड़की थी, जिसे शराब पीने वालों से नफरत थी। लेकिन उसी लड़की ने अपने प्यार के लिए ऐसी बातें भी सह लीं, जिन्हें वह कभी अपनी जिंदगी में स्वीकार नहीं करना चाहती थी।
शायद मोहब्बत में हम हमेशा कमजोर नहीं होते, लेकिन कभी-कभी अपने ही फैसलों को सही साबित करने में इतने उलझ जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि हमें खुद भी ठीक रहना है।
मैं आरव को बदलना चाहती थी।
लेकिन उस कोशिश में मुझे खुद को संभालना भी सीखना था।
यह सीख मुझे बहुत देर से मिली।
और इसीलिए आज जब मैं अपनी कहानी याद करती हूं, तो सिर्फ आरव को याद नहीं करती।
मैं उस मीरा को भी याद करती हूं, जो किसी की खुशी के लिए अपनी तकलीफ भूल जाती थी। जो एक फोन के इंतजार में रातभर जाग सकती थी। जो किसी के बदल जाने की उम्मीद में अपने ही दुख को बार-बार दबा देती थी।
उस लड़की के लिए मेरे मन में आज भी प्यार है।
क्योंकि वह गलत नहीं थी कि उसने प्यार किया।
बस उसे यह सीखने में वक्त लगा कि प्यार करते हुए खुद से प्यार करना भी जरूरी होता है।
17. अगर उस दिन हम लड़ लेते तो?
यह सवाल मेरे मन में कई बार आया है।
अगर उस दिन मैं खामोश न होती, तो क्या होता?
अगर मैं उसे फोन करके पूछ लेती कि आखिर उसने मुझे ऐसी बातें क्यों कहीं, तो क्या वह मुझे समझाता?
अगर वह खुद फोन कर लेता, तो क्या मैं उसे माफ कर देती?
अगर हम दोनों सामने होते, तो क्या एक-दूसरे को देखकर हमारा गुस्सा खत्म हो जाता?
अगर हमारी आखिरी मुलाकात हो जाती, तो क्या हम एक-दूसरे को रोक लेते?
इन सवालों का जवाब मेरे पास नहीं है।
कभी-कभी मन कहता है कि काश वह एक बार सामने आ जाता। काश मैं उसे आखिरी बार देख पाती। काश वह मेरी आंखों में देखकर समझ पाता कि उसकी खामोशी ने मुझे कितना दुख दिया।
लेकिन फिर मैं खुद से पूछती हूं—क्या हर अधूरी कहानी को पूरा करने के लिए एक आखिरी मुलाकात जरूरी होती है?
शायद नहीं।
कभी-कभी आखिरी मुलाकात के बाद भी सवाल बाकी रहते हैं।
कभी सामने बैठकर बातें करने के बाद भी दिल को जवाब नहीं मिलता।
और कभी बिना मिले भी हम यह समझ सकते हैं कि अब उस रास्ते पर लौटना हमारे लिए सही नहीं है।
मैंने अपनी जिंदगी में यही स्वीकार करना सीखा है।
मुझे आरव से शिकायतें थीं। बहुत सारी बातें थीं, जो मैं उससे कहना चाहती थी। लेकिन समय के साथ मुझे एहसास हुआ कि हर शिकायत का जवाब उसी इंसान से मिले, यह जरूरी नहीं।
कुछ जवाब हमें अपने भीतर खोजने पड़ते हैं।
मुझे यह समझना था कि मैं क्यों इतने समय तक इंतजार करती रही।
क्यों मुझे लगता था कि वह लौटेगा, तो सब ठीक हो जाएगा।
क्यों मैंने उसकी पुरानी बातों को उसके वर्तमान व्यवहार से ज्यादा महत्व दिया।
और क्यों मैं उसकी खामोशी को भी अपने प्यार की परीक्षा समझती रही।
इन सवालों ने मुझे तकलीफ दी, लेकिन इन्होंने मुझे खुद को समझने में भी मदद की।
मैं आज भी यह नहीं कह सकती कि अगर हम उस दिन लड़ लेते, तो हमारी कहानी का अंत अलग होता।
लेकिन मैं इतना जरूर जानती हूं कि उस दिन के बाद मेरी जिंदगी बदल गई।
मैंने किसी के इंतजार में फोन की स्क्रीन देखना कम करना सीखा।
मैंने अपने दुख को खुद से छिपाना कम किया।
और धीरे-धीरे यह भी सीखा कि कभी-कभी किसी रिश्ते को छोड़ देना, उससे प्यार न करने का सबूत नहीं होता।
कभी-कभी यह खुद को बचाने का तरीका होता है।
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18. कुछ यादें वक्त के साथ भी खत्म नहीं होतीं
लोग कहते हैं कि वक्त सब ठीक कर देता है।
मुझे लगता है कि वक्त हर चीज ठीक नहीं करता। वह हमें चीजों के साथ जीना सिखाता है।
कुछ यादें खत्म नहीं होतीं। वे बस हमारे भीतर एक ऐसी जगह पर चली जाती हैं, जहां हम रोज नहीं जाते।
कभी कोई पुराना गाना सुनकर वे यादें सामने आ जाती हैं।
कभी किसी के फोन की घंटी सुनकर पुराने दिन याद आ जाते हैं।
कभी रात के आठ बजते हैं, तो बिना किसी वजह के वही पुरानी आदत याद आ जाती है।
और कभी अचानक मन में सवाल आता है कि वह इंसान अब कैसा होगा, जिसे कभी हम अपनी दुनिया समझते थे।
मेरे साथ भी ऐसा होता है।
कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्या आरव को भी वे दिन याद आते होंगे?
क्या उसे भी कभी हमारी लंबी बातें याद आती होंगी?
क्या उसे भी कभी मेरी कही कोई बात याद आ जाती होगी?
मैं नहीं जानती।
और अब मुझे इन सवालों के जवाब ढूंढने की जरूरत भी नहीं लगती।
हो सकता है उसे याद आता हो।
हो सकता है वह अपनी जिंदगी में इतना आगे बढ़ चुका हो कि अब उन बातों को याद करने का वक्त भी न मिलता हो।
दोनों ही बातें संभव हैं।
लेकिन मेरी यादों की सच्चाई इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह उन्हें याद करता है या नहीं।
जो मैंने महसूस किया, वह सच था।
जो प्यार मैंने किया, वह सच था।
जो दुख मुझे मिला, वह भी सच था।
और जिस तरह मैंने खुद को संभालना सीखा, वह भी मेरी जिंदगी का हिस्सा है।
मैं अपने अतीत को मिटा नहीं सकती, लेकिन उसके कारण अपने वर्तमान को हमेशा अधूरा भी नहीं रख सकती।
शायद यही आगे बढ़ना है।
किसी को पूरी तरह भूल जाना नहीं, बल्कि उसकी याद आने पर खुद को फिर से उसी दर्द में डूबने से बचाना।
किसी के लौटने की उम्मीद छोड़ देना, लेकिन अपने जीवन से उम्मीद न छोड़ना।
और यह मान लेना कि हमारी कहानी में जो हुआ, वह हमारी जिंदगी का एक हिस्सा था, पूरी जिंदगी नहीं।
19. अधूरी मुलाकात का सबसे बड़ा दर्द
आज जब मैं अपनी कहानी को पीछे मुड़कर देखती हूं, तो मुझे सबसे ज्यादा दर्द किसी एक लड़ाई का नहीं होता।
न उसकी किसी एक बात का।
न उन रातों का, जब मैं रोई थी।
सबसे ज्यादा दर्द उस अधूरेपन का होता है, जो हमारे रिश्ते के साथ जुड़ गया।
हमने एक-दूसरे से बहुत बातें कीं, लेकिन कुछ बातें हमेशा के लिए अनकही रह गईं।
हमने एक-दूसरे को अपने दिल के करीब रखा, लेकिन आखिर में आमने-सामने बैठकर यह भी नहीं कह पाए कि अब हम अपनी-अपनी जिंदगी में अलग रास्ते पर जा रहे हैं।
हमने एक-दूसरे से वादे किए, लेकिन उन वादों का आखिरी हिसाब कभी नहीं हुआ।
हमने मिलने के सपने देखे, लेकिन फिर ऐसा वक्त आया कि हम मिले ही नहीं।
और इस तरह हमारी कहानी में एक मुलाकात से ज्यादा उसकी कमी रह गई।
लोग शायद पूछेंगे कि जब रिश्ता खत्म हो गया, तो फिर इतनी पुरानी बातों को याद करने का क्या मतलब?
लेकिन जो इंसान कभी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहा हो, उसकी यादें कैलेंडर देखकर नहीं आतीं।
उन्हें यह नहीं पता होता कि कितने साल बीत चुके हैं।
वे बस कभी भी सामने आ जाती हैं।
कभी हंसाती हैं।
कभी रुलाती हैं।
और कभी हमें यह याद दिलाती हैं कि हम भी कभी किसी को टूटकर चाहते थे।
मैंने आरव से मोहब्बत की थी। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है।
मैंने उस पर भरोसा किया था। यह मेरी भावनाओं की सच्चाई थी।
मैंने उसके लिए कोशिश की थी। यह मेरे प्यार का हिस्सा था।
लेकिन मैंने इस रिश्ते में कुछ गलतियां भी कीं। मैंने कई बार अपनी जरूरतों को पीछे रखा। मैंने सोचा कि अगर मैं और प्यार दूंगी, तो शायद सब ठीक हो जाएगा। मैंने इंतजार को अपनी जिम्मेदारी समझ लिया।
अब मैं जानती हूं कि किसी रिश्ते को अकेला इंसान नहीं बचा सकता।
प्यार के लिए दोनों का साथ जरूरी है।
बातचीत जरूरी है।
एक-दूसरे की इज्जत जरूरी है।
और जब गलतियां हों, तो उन्हें सुधारने की इच्छा भी जरूरी है।
सिर्फ पुरानी यादें किसी रिश्ते को जिंदा नहीं रख सकतीं।
सिर्फ वादे भी नहीं।
कभी-कभी दो लोगों के बीच प्यार होने के बावजूद वे एक-दूसरे के लिए सही साथी नहीं रह जाते।
यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन शायद इसी में आगे बढ़ने की शुरुआत छिपी होती है।
20. आज मैं वही नहीं हूं, जो उस दिन थी
आज मैं अपनी जिंदगी को एक अलग नजरिए से देखती हूं।
मैं यह नहीं कहती कि मैंने सब कुछ भूल दिया है। मैं यह भी नहीं कहती कि अब कोई दर्द नहीं होता।
कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें भूलने का दावा करना अपने आप से झूठ बोलने जैसा लगता है।
लेकिन अब मैं उस लड़की जैसी नहीं हूं, जो हर रात आठ बजे फोन की स्क्रीन देखती थी।
अब मैं किसी के फोन न करने को अपनी कमी का सबूत नहीं मानती।
अब मैं किसी के बदल जाने पर खुद को दोष नहीं देती।
और अब मैं यह भी समझती हूं कि किसी की जिंदगी में अपनी जगह बनाए रखने के लिए हमें लगातार खुद को साबित करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए।
जो इंसान हमारे साथ रहना चाहता है, उसे भी इस रिश्ते को निभाने की कोशिश करनी चाहिए।
हम किसी को मजबूर करके प्यार नहीं करा सकते।
हम किसी को बार-बार समझाकर अपने लिए वक्त निकालने पर मजबूर नहीं कर सकते।
और हम अपनी पूरी जिंदगी इस उम्मीद में नहीं बिता सकते कि एक दिन सामने वाला पहले जैसा हो जाएगा।
यह बातें सुनने में आसान हैं, लेकिन इन्हें अपनी जिंदगी में स्वीकार करना बहुत मुश्किल होता है।
मैंने भी इन्हें धीरे-धीरे सीखा है।
कभी रोकर।
कभी चुप रहकर।
कभी पुरानी यादों को देखकर।
और कभी खुद से यह सवाल करके कि आखिर मैं कब तक उसी दरवाजे की तरफ देखती रहूंगी, जहां से कोई लौटकर नहीं आ रहा?
एक दिन मुझे समझ आया कि मेरी जिंदगी सिर्फ किसी के लौटने का इंतजार करने के लिए नहीं बनी।
मेरे भी सपने हैं।
मेरी भी खुशियां हैं।
मेरे भी अपने लोग हैं।
और मुझे अपने लिए भी जीना है।
आरव मेरी कहानी का हिस्सा था।
लेकिन मेरी पूरी कहानी नहीं।
शायद आज मैं उसे याद करते हुए यह बात कह सकती हूं, क्योंकि वक्त ने मुझे अपने भीतर झांकना सिखाया है।
मैंने उससे प्यार किया था।
मैंने उसे खोया भी।
लेकिन उसके साथ मैंने अपने बारे में भी बहुत कुछ सीखा।
21. कुछ रिश्ते अधूरे रहकर भी हमें पूरा कर जाते हैं
कभी-कभी सोचती हूं कि अगर आरव मेरी जिंदगी में नहीं आता, तो शायद मैं प्यार को कभी इस तरह समझ ही नहीं पाती।
मैंने उससे सीखा कि किसी की छोटी-सी बात भी हमारे लिए कितनी मायने रख सकती है।
मैंने उससे सीखा कि किसी की आवाज भी सुकून बन सकती है।
मैंने उससे सीखा कि किसी के चेहरे की मुस्कान देखकर हमारे भीतर भी खुशी जाग सकती है।
लेकिन मैंने यह भी सीखा कि प्यार में किसी को इतना महत्व नहीं देना चाहिए कि हम अपने ही दुख को पहचानना बंद कर दें।
मैंने जाना कि किसी की फिक्र करना अच्छी बात है, लेकिन उसकी हर गलती को अपनी जिम्मेदारी समझ लेना सही नहीं।
किसी का साथ देना खूबसूरत है, लेकिन उसके साथ रहने के लिए खुद को हर बार तोड़ना जरूरी नहीं।
और किसी से मोहब्बत करना बहुत बड़ी बात है, लेकिन उस मोहब्बत में अपना आत्मसम्मान खो देना प्यार की शर्त नहीं है।
शायद आरव मेरी जिंदगी में हमेशा रहने के लिए नहीं आया था।
शायद कुछ लोग हमें कुछ सिखाने आते हैं।
वे हमें हंसाते हैं, हमारे भीतर ऐसी भावनाएं जगाते हैं, जिनके बारे में हमें पहले पता नहीं होता। वे हमें हमारे ही दिल से मिलवाते हैं।
और फिर किसी मोड़ पर हमसे अलग हो जाते हैं।
उनके जाने के बाद हम पहले जैसे नहीं रहते।
हम कुछ खोते हैं, कुछ समझते हैं और कुछ नया सीखते हैं।
मैं भी पहले जैसी नहीं रही।
आज अगर कोई मुझसे पूछे कि प्यार क्या है, तो शायद मैं पहले की तरह इसका जवाब देने में घबराऊंगी नहीं।
मैं कहूंगी कि प्यार सिर्फ किसी को याद करने का नाम नहीं है।
प्यार किसी की बात सुनने, उसे समझने और उसके साथ जिम्मेदारी से रिश्ता निभाने का नाम है।
प्यार में भावनाएं जरूरी हैं, लेकिन व्यवहार भी उतना ही जरूरी है।
किसी का हमारे लिए रोना खूबसूरत हो सकता है, लेकिन हमारे आंसुओं को बार-बार नजरअंदाज करना प्यार की निशानी नहीं है।
किसी का हमारे लिए वादे करना अच्छा लगता है, लेकिन उन वादों को निभाने की कोशिश उससे भी ज्यादा जरूरी है।
और सबसे जरूरी बात—किसी से प्यार करते हुए खुद को भूल जाना जरूरी नहीं है।
मैंने यह सब बहुत देर से सीखा।
लेकिन देर से सीखी हुई बात भी जिंदगी बदल सकती है।
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22. वह अधूरी मुलाकात और खामोशियां
आज भी कभी-कभी मेरे दिल में एक सवाल उठता है—अगर उस दिन हम आमने-सामने होते, तो क्या हमारी कहानी का अंत कुछ अलग होता?
शायद मैं उससे पूछती कि उसने मुझे इतनी आसानी से अकेला कैसे छोड़ दिया।
शायद वह कहता कि उससे भी गलतियां हुईं।
शायद हम दोनों रो पड़ते।
शायद कुछ पल के लिए सब कुछ फिर से पहले जैसा लगने लगता।
लेकिन जिंदगी ने हमें वह मौका नहीं दिया।
और अब इतने समय बाद उस मुलाकात की उम्मीद करना भी शायद सही नहीं।
आज उसकी अपनी जिंदगी है। उसकी पत्नी है, उसका परिवार है और उसकी जिम्मेदारियां हैं। मैं उसके जीवन में दखल नहीं देना चाहती। मैं बस अपनी यादों के उस हिस्से को शब्द देना चाहती हूं, जिसे मैंने लंबे समय तक अपने भीतर रखा।
क्योंकि कुछ कहानियां किसी को वापस पाने के लिए नहीं लिखी जातीं।
कुछ कहानियां इसलिए लिखी जाती हैं, ताकि हम अपने दिल में दबे हुए एहसासों को समझ सकें।
ताकि हम स्वीकार कर सकें कि हमने किसी को चाहा था।
ताकि हम उस इंसान को भी माफ कर सकें, जिसने हमें दुख दिया, और उस खुद को भी, जिसने बहुत देर तक इंतजार किया।
मैं नहीं जानती कि आरव कभी मेरी कहानी पढ़ेगा या नहीं।
मैं नहीं जानती कि उसे हमारी पुरानी बातें याद आती हैं या नहीं।
मैं नहीं जानती कि उसे कभी एहसास होता है या नहीं कि किसी के लिए उसका फोन कितना जरूरी हुआ करता था।
लेकिन अब मैं अपनी कहानी उसके जवाब के इंतजार में नहीं छोड़ना चाहती।
यह कहानी मेरी भी है।
उस लड़की की, जिसने दोस्ती को प्यार समझने में वक्त लिया।
उस लड़की की, जिसने पहली बार किसी को दिल से चाहा।
उस लड़की की, जो रात के आठ बजे फोन की स्क्रीन देखती थी।
उस लड़की की, जिसने किसी की मुस्कान के लिए अपनी नाराजगी भुला दी।
उस लड़की की, जिसने एक दिन खुद से वादा किया कि अब वह फोन नहीं करेगी।
और उस लड़की की, जिसने धीरे-धीरे यह सीखा कि खामोशी के बाद भी जिंदगी खत्म नहीं होती।
कभी-कभी हमारी सबसे बड़ी अधूरी कहानी हमें अपनी जिंदगी का सबसे जरूरी सबक दे जाती है।
आरव मेरी जिंदगी में आया था, तो मुझे लगा था कि शायद यही वह इंसान है, जिसके साथ मैं अपनी पूरी जिंदगी बिताऊंगी।
लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो समझ आता है कि हर वह इंसान, जिसे हम हमेशा के लिए चाहते हैं, हमेशा के लिए हमारे साथ रहे, यह जरूरी नहीं।
कुछ लोग हमारे दिल में रहते हैं, जिंदगी में नहीं।
कुछ वादे यादों में रह जाते हैं।
कुछ बातें अधूरी रह जाती हैं।
कुछ मुलाकातें कभी हो ही नहीं पातीं।
और कुछ रिश्ते बिना किसी आखिरी शब्द के खत्म हो जाते हैं।
मेरी और आरव की कहानी भी ऐसी ही थी।
हमने एक-दूसरे से बहुत कुछ कहा था, लेकिन आखिरी बात कहने का मौका कभी नहीं मिला।
हमने एक-दूसरे को बहुत चाहा था, लेकिन आखिरी बार एक-दूसरे को देखने का मौका नहीं मिला।
हम एक-दूसरे की जिंदगी में बहुत करीब थे, लेकिन अंत में हमारे बीच इतनी दूरी आ गई कि हम फिर कभी मिले ही नहीं।
शायद इसी को अधूरी मुलाकात कहते हैं।
और शायद इसी को खामोशी।
एक ऐसी खामोशी, जिसमें हजारों बातें छिपी होती हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता।
एक ऐसा इंतजार, जो धीरे-धीरे आदत बन जाता है।
एक ऐसी याद, जो समय के साथ कम तो हो सकती है, लेकिन कभी-कभी अचानक लौटकर हमें फिर उसी मोड़ पर खड़ा कर देती है।
मैंने आरव से प्यार किया था।
मैंने उसे खोया भी।
और आज मैं अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना सीख रही हूं।
मैं अब यह नहीं चाहती कि वह वापस आए और मेरी हर अधूरी बात का जवाब दे।
मैं बस इतना चाहती हूं कि एक दिन जब मैं इन यादों को पलटकर देखूं, तो मेरे चेहरे पर दर्द से ज्यादा सुकून हो।
मैं यह सोचकर मुस्कुरा सकूं कि मैंने कभी किसी को सच्चे दिल से चाहा था।
मैं यह मान सकूं कि उस रिश्ते में जो अच्छा था, वह मेरी जिंदगी का खूबसूरत हिस्सा था और जो बुरा था, उसने मुझे मजबूत होना सिखाया।
और मैं यह भी समझ सकूं कि किसी कहानी का अधूरा रह जाना, उस कहानी में महसूस किए गए प्यार को झूठा नहीं बना देता।
हर मोहब्बत शादी तक नहीं पहुंचती।
हर वादा उम्रभर नहीं निभता।
हर अपना हमेशा अपना नहीं रहता।
लेकिन हर रिश्ता हमें कुछ न कुछ सिखाकर जरूर जाता है।
आरव ने मुझे भी बहुत कुछ सिखाया।
सबसे बड़ी बात यह कि किसी से इतना प्यार मत करना कि उसके बिना खुद को पहचानना ही भूल जाओ।
किसी पर इतना भरोसा मत करना कि उसकी खामोशी में अपनी गलती खोजते रहो।
और किसी के लौटने का इतना इंतजार मत करना कि अपनी जिंदगी को ही रोक दो।
क्योंकि जिंदगी किसी एक इंसान के जाने से खत्म नहीं होती।
हां, कुछ समय के लिए दुनिया जरूर बदल जाती है।
कुछ रातें लंबी हो जाती हैं।
कुछ सुबहें भारी लगती हैं।
कुछ गाने सुनना मुश्किल हो जाता है।
लेकिन धीरे-धीरे हम फिर से जीना सीख लेते हैं।
मैंने भी सीखा।
आज भी कभी-कभी दिल पुराने दिनों की तरफ लौट जाता है। कभी उसकी बातें याद आती हैं, कभी उसकी हंसी और कभी वह आठ बजे वाला फोन।
लेकिन अब मैं उन यादों के साथ बैठ सकती हूं, बिना इस उम्मीद के कि वह लौटकर सब कुछ ठीक कर देगा।
क्योंकि अब मैं जानती हूं कि कुछ कहानियों को पूरा करने के लिए दोबारा मिलना जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी उनका अधूरा रह जाना ही उनका आखिरी सच होता है।
और मेरी कहानी का सच यही है।
एक लड़का था, जिससे मैंने दोस्ती की।
धीरे-धीरे मुझे उससे मोहब्बत हो गई।
हमने सपने देखे, वादे किए, खूब बातें कीं, बहुत लड़े और कई बार एक-दूसरे को मनाया।
फिर एक दिन सब कुछ खामोश हो गया।
न कोई आखिरी मुलाकात हुई।
न कोई ठीक से अलविदा कहा गया।
न कोई ऐसा जवाब मिला, जिससे दिल पूरी तरह मान जाता।
बस वक्त गुजरता गया और हम अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए।
वह अपनी दुनिया में है।
मैं अपनी दुनिया में हूं।
लेकिन मेरी जिंदगी की किताब में एक पन्ना ऐसा है, जिसे मैं चाहकर भी पूरी तरह फाड़ नहीं सकती।
उस पन्ने पर कुछ हंसी है, कुछ आंसू हैं, कुछ वादे हैं, कुछ शिकायतें हैं और बहुत सारी खामोशियां हैं।
उस पन्ने का नाम है—वह अधूरी मुलाकात और खामोशियां।
और शायद जिंदगी में कुछ पन्ने ऐसे ही होते हैं।
वे पूरे नहीं लिखे जाते, फिर भी हमारी कहानी का सबसे अहम हिस्सा बन जाते हैं।
अगर आपकी जिंदगी में भी कोई ऐसी अधूरी कहानी है, कोई ऐसा इंसान है जिससे बहुत कुछ कहना बाकी रह गया, तो याद रखिए—हर अधूरी मुलाकात का मतलब अधूरी जिंदगी नहीं होता। कभी-कभी किसी का चले जाना हमें खुद तक लौटना सिखा देता है।
कुछ लोग हमारी जिंदगी से चले जाते हैं, लेकिन हमें अपने बारे में बहुत कुछ सिखा जाते हैं।
और कुछ कहानियां खत्म होकर भी हमारे भीतर चलती रहती हैं।
बस फर्क इतना होता है कि पहले हम उन कहानियों में किसी के लौटने का इंतजार करते हैं, और फिर एक दिन सीख जाते हैं कि अब अपनी जिंदगी की अगली कहानी खुद लिखनी है।
मेरी कहानी भी अब आगे बढ़ रही है।
वह अधूरी मुलाकात आज भी अधूरी है।
कुछ सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।
लेकिन अब मैं उन सवालों के साथ जीना सीख गई हूं।
क्योंकि मैंने समझ लिया है कि हर बात का जवाब मिलना जरूरी नहीं होता, हर रिश्ता मुकम्मल होना जरूरी नहीं होता और हर इंसान का जिंदगीभर साथ रहना भी जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी जो चला जाता है, वह हमें यह सिखाने के लिए जाता है कि हमें खुद का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
और शायद मेरी अधूरी मोहब्बत का सबसे खूबसूरत सबक यही है।
कुछ मुलाकातें अधूरी रह जाती हैं, कुछ खामोशियां कभी टूटती नहीं, लेकिन जिंदगी फिर भी आगे बढ़ती रहती है।
विधि सैनी
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Agar Vidhi saini ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:









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