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एक चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई

कुंदन राज दत्ता "निश्छल" • Superstar Writer • Sahitya Ratna
एक चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई
एक चिट्ठी, जो कभी भेजी नहीं गई

बारिश की उस शाम में कुछ खास नहीं था।

आसमान सुबह से ही धुंधला था और शाम होते-होते बारिश ने शहर की सड़कों को पूरी तरह भिगो दिया था। खिड़की के शीशे पर पानी की बूंदें लगातार फिसल रही थीं। सामने वाली गली में लगी पीली स्ट्रीट लाइट बारिश के पानी में अपना धुंधला-सा अक्स बना रही थी।

कमरे में सिर्फ टेबल लैंप जल रहा था। अमित काफी देर से उसी मेज के सामने बैठा था। सामने एक सफेद कागज रखा था।

कागज के ऊपर उसने सिर्फ इतना लिखा था

“प्रिय”

इसके आगे कलम रुक गई।

वह कुछ देर तक उस एक शब्द को देखता रहा। फिर हल्का-सा मुस्कुराया।

प्रिय?

उसने खुद से पूछा, इतने साल बाद भी नाम लिखने की हिम्मत नहीं है?

उसने कलम मेज पर रख दी। कुर्सी से पीठ टिकाई और आँखें बंद कर लीं।

 

अजीब बात थी। जिस लड़की के सामने बैठकर वह कभी घंटों चुप रह सकता था, उसी लड़की के नाम एक चिट्ठी लिखने में उसे आज भी डर लग रहा था।

 

उसका नाम था, नैना। नैना उसकी जिंदगी में किसी फिल्म की तरह नहीं आई थी। न कोई पहली नजर का प्यार था।

न कोई ऐसा दिन था जिसे वह अपनी जिंदगी का सबसे खूबसूरत दिन कह सके। वह बस एक दिन आई थी। बहुत साधारण तरीके से और शायद इसी वजह से वो इतनी खास हो गई थी।

 

करीब आठ साल पहले की बात थी। अमित उस समय कॉलेज के अंतिम वर्ष में था। पढ़ाई ठीक-ठाक चल रही थी। जिंदगी भी बाकी लड़कों जैसी ही थी, सुबह कॉलेज, दोस्तों के साथ चाय, कभी-कभी फिल्म, परीक्षा के समय किताबें और परीक्षा खत्म होते ही उन किताबों से दूरी। उसी दौरान नैना उनकी कक्षा में आई थी। वह दूसरे शहर से ट्रांसफर होकर आई थी। पहले दिन वह पीछे वाली बेंच पर बैठी थी। हाथ में नीली फाइल थी और बालों को एक साधारण-सी क्लिप से बांध रखा था। अमित ने उसे पहली बार तभी देखा था। लेकिन उसने उस समय कोई खास ध्यान नहीं दिया। अगले दिन भी नहीं। तीसरे दिन शायद इसलिए ध्यान गया क्योंकि नैना ने पूरी कक्षा में घूमकर सभी से नोट्स मांगे थे और अंत में अमित की सीट के पास आकर रुक गई थी।

 

नैना, आपके पास पिछले हफ्ते वाले नोट्स हैं?

अमित ने सिर उठाकर देखा और कहा, हाँ।

नैना, मिल सकते हैं क्या?

अमित, हाँ क्यों नहीं।

उसने अपनी कॉपी उसकी तरफ बढ़ा दी।

नैना ने कॉपी लेते हुए कहा, कल वापस कर दूँगी।

अमित ने बस सिर हिला दिया। उस दिन पहली बार उनकी बात हुई थी और अगले दिन नैना ने सच में कॉपी वापस कर दी।

कॉपी देते हुए उसने कहा, थैंक यू।

अमित, कोई बात नहीं।

 

बस इतनी ही बात हुई अमित की नैना से।

लेकिन उस रात अमित ने जाने क्यों अपनी वही कॉपी दोबारा खोलकर देखी थी। उसमें कुछ भी अलग नहीं था।

सिर्फ नैना की लिखावट के दो-चार छोटे निशान थे।

एक जगह उसने पेंसिल से प्रश्न के पास छोटा-सा निशान लगाया था।

अमित ने उसे मिटाया नहीं। उसे खुद नहीं पता था क्यों।

शायद यहीं से कुछ शुरू हुआ था। बहुत धीरे। बिना किसी आवाज के। धीरे-धीरे दिन आगे बढ़ते गए, उनकी मुलाकातें बढ़ती गई और साथ ही साथ दोनों की दोस्ती भी हो गई।

कॉलेज में अक्सर साथ बैठने लगे, कभी कैंटीन में चाय तो कभी लाइब्रेरी।

कभी कॉलेज से निकलते समय सड़क के किनारे दस मिनट खड़े होकर बेवजह बातें।

नैना बहुत ज्यादा बोलती थी और अमित कम।

नैना कहती, तुम इतने चुप क्यों रहते हो?

अमित हंसकर कहता, तुम दोनों का काम कर देती हो।

नैना, मतलब?

अमित, तुम खुद बोलती हो और मेरी तरफ से भी बोल देती हो।

नैना हंस पड़ती। बहुत चालाक हो।

 

अमित, हाँ।

नैना, अच्छा?

अमित, हाँ।

नैना, झूठे।

अमित, वो भी हूँ।

 

दोनों हंसते। उनकी दोस्ती में कोई बड़ा वादा नहीं था। कोई भविष्य की योजना नहीं थी।

 

लेकिन कुछ चीजें ऐसी थीं जिन्हें अमित अपने भीतर बहुत गंभीरता से रखने लगा था। उसे याद रहता था कि नैना चाय में चीनी कम लेती है।

उसे याद रहता था कि उसे बारिश पसंद है, लेकिन भीगना नहीं। उसे पता था कि परीक्षा से पहले वह बहुत परेशान हो जाती है। उसे पता था कि जब वह गुस्सा होती है तो ज्यादा बोलने के बजाय अचानक चुप हो जाती है।

और सबसे अजीब बात, नैना को शायद इन सबका अंदाजा भी नहीं था।

 

एक दिन दोनों कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठे थे। उस दिन नैना बहुत चुप थी।

अमित ने पूछा, क्या हुआ?

नैना, कुछ नहीं।

अमित, पक्का?

नैना, हाँ।

अमित, तुम्हारा कुछ नहीं वाला चेहरा देखकर कोई भी समझ सकता है कि कुछ हुआ है।

नैना ने उसकी तरफ देखा। तुम मुझे इतना पढ़ने कब लगे?

अमित के पास कोई जवाब नहीं था। वह हंसकर बोला, तुम्हारे साथ रोज बैठता हूँ, इतना तो पता चल ही जाता है।

नैना कुछ देर उसे देखती रही।

फिर मुस्कुराकर बोली, तुम अच्छे दोस्त हो।

अमित ने भी मुस्कुराकर कहा, हाँ।

 

उसने उस दिन पहली बार महसूस किया था कि कभी-कभी एक शब्द इंसान को बहुत खुशी भी देता है और बहुत दुख भी।

 

दोस्त।

 

उसे नैना से कुछ और चाहिए था। लेकिन वह कह नहीं पाया।

कॉलेज खत्म होने का समय आ गया। सब अपने-अपने भविष्य की चिंता में लग गए। कोई नौकरी ढूंढ रहा था। कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था।

किसी ने आगे पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाने का फैसला किया।

 

नैना भी दिल्ली जाने वाली थी। उस दिन कॉलेज का आखिरी दिन था।

नैना ने अमित से कहा, अब तो तुम्हें मुझे मिस करना पड़ेगा।

अमित ने मजाक में कहा, इतनी जल्दी छुटकारा नहीं मिलेगा। फोन है न।

नैना, सच में फोन करोगे?

अमित, हाँ।

नैना, हर हफ्ते?

अमित, देखेंगे।

नैना, मतलब नहीं करोगे।

अमित, तुम कर लेना।

नैना मुस्कुराई। ठीक है।

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फिर उसने कहा, अमित, तुमसे एक बात कहूँ?

अमित, हूँ।

नैना, तुमने कॉलेज में कभी किसी को पसंद किया?

 

अमित का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया। वह चाहता तो उसी वक्त सब कह सकता था।

बस एक शब्द, तुम्हें।

लेकिन उसके मुंह से निकला, नहीं।

नैना ने पूछा, पक्का?

अमित, हाँ।

नैना, अजीब हो।

अमित, क्यों?

नैना, इतने साल में किसी को पसंद ही नहीं किया?

अमित ने मुस्कुराकर कहा, शायद सही इंसान मिला नहीं।

 

नैना ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर बाद उसने अपना बैग उठाया। चलती हूँ।

अमित, हाँ।

नैना, अपना ख्याल रखना।

नैना, तुम भी।

 

वह कुछ कदम चली। फिर पीछे मुड़ी और कहा, अमित।

अमित, हाँ?

नैना, दोस्त रहोगे न?

अमित ने मुस्कुराकर कहा, हमेशा।

 

नैना चली गई और अमित बहुत देर तक उसी जगह खड़ा रहा।

उसे उस दिन समझ आया कि किसी को खोना हमेशा उसके चले जाने से नहीं होता। कभी-कभी उसे अपने पास रखते हुए भी खो दिया जाता है।

शुरुआत में दोनों की बातें होती रहीं। फिर धीरे-धीरे कम हो गईं। पहले रोज। फिर हर दो-तीन दिन। फिर हफ्ते में।

और एक दिन ऐसा आया जब कई महीने गुजर गए।

जिंदगी आगे बढ़ती रही। अमित को नौकरी मिल गई।

नैना भी अपने काम में व्यस्त हो गई।

सोशल मीडिया पर कभी-कभी उसकी तस्वीर दिखाई दे जाती। किसी किताब के साथ। किसी ऑफिस के कार्यक्रम में। कभी दोस्तों के साथ। अमित उन तस्वीरों को देखता और फोन रख देता। कभी-कभी वह नैना का प्रोफाइल खोलता। कुछ लिखता। फिर मिटा देता।

कैसी हो? बहुत साधारण था। लेकिन भेजने में भी जाने क्यों डर लगता था।

 

एक बार उसने लिखा, तुम्हारी याद आती है। फिर वह संदेश भी मिटा दिया। उसे लगता था, इतने साल बाद ऐसा लिखना अजीब लगेगा। फिर एक दिन नैना की शादी की तस्वीर सामने आई। अमित काफी देर तक फोन की स्क्रीन देखता रहा। तस्वीर में नैना मुस्कुरा रही थी।

वह वही मुस्कान थी जिसे उसने कॉलेज की कैंटीन में कितनी बार देखा था। लेकिन इस बार उसके पास खड़ा कोई और था।

अमित ने फोन बंद कर दिया।

उस रात उसने पहली बार अपने कमरे में बैठकर रोया था।

बहुत ज्यादा नहीं। बस थोड़ी देर।

शायद इसलिए कि वह नैना को खोने पर नहीं रो रहा था।

वह उस बात पर रो रहा था जो उसने कभी कही ही नहीं थी।

कई साल बीत गए। अमित ने शादी नहीं की। लोग पूछते तो वह हंसकर बात टाल देता।

अभी मन नहीं है।

लेकिन सच यह था कि उसका मन कहीं अटका हुआ था।

उसे खुद भी पता नहीं था कि वह किसका इंतजार कर रहा है।

नैना का? या उस दिन का जब वह अपने आप से कह सके कि अब कोई अफसोस नहीं है?

फिर एक दिन उसे पुराने सामान के बीच कॉलेज की वही कॉपी मिल गई।

जिसमें कभी नैना ने नोट्स लिए थे। कॉपी के बीच एक छोटा-सा कागज दबा था।

उस पर नैना की लिखावट थी, अमित, तुम्हारे नोट्स बहुत अच्छे हैं। तुम पढ़ाई में सच में अच्छे हो।

बस इतना।

अमित उस कागज को देर तक देखता रहा। फिर उसे हंसी आ गई।

पागल लड़की…

उसने धीरे से कहा। फिर उसकी आंखें भर आईं।

उसने उसी रात चिट्ठी लिखने का फैसला किया।

उसे मालूम था कि वह चिट्ठी कभी नहीं भेजेगा।

फिर भी।

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शायद कुछ बातें इंसान किसी दूसरे के लिए नहीं, खुद के लिए लिखता है। वह फिर उसी मेज पर बैठा था।

सामने वही सफेद कागज था। उसने कलम उठाई और इस बार लिखना शुरू किया।

 

प्रिय नैना,

पता नहीं यह चिट्ठी क्यों लिख रहा हूँ।

शायद इसलिए कि जिंदगी में कुछ बातें ऐसी रह जाती हैं जिन्हें हम किसी से कह नहीं पाते। और फिर उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए, वे बातें हमारे भीतर कहीं न कहीं वैसे ही पड़ी रहती हैं।

तुम्हें शायद याद भी न हो कि पहली बार हमने कब बात की थी। मुझे याद है। तुमने मुझसे नोट्स मांगे थे।

अजीब है न? तुम्हारे लिए वह बस एक छोटी-सी बात थी और मेरे लिए वही एक याद बन गई।

अमित लिखते-लिखते मुस्कुराया। फिर आगे लिखा,

 

तुम्हें पता है, तुम्हारी बहुत-सी छोटी बातें मुझे आज भी याद हैं। तुम चाय में चीनी कम लेती थीं।

बारिश देखकर खुश होती थीं, लेकिन भीगना पसंद नहीं था। जब परेशान होती थीं तो बहुत कम बोलती थीं।

और जब बिना वजह हंसती थीं तो तुम्हारे आसपास बैठे लोगों का मूड भी ठीक हो जाता था। मैं तुम्हें बहुत कुछ बताना चाहता था।

कई बार तुम्हारे सामने बैठकर मन हुआ कि कह दूँ, नैना, मैं तुम्हें पसंद करता हूँ। लेकिन हर बार डर गया। मुझे डर था कि अगर तुमने मना कर दिया तो?

लेकिन उससे भी ज्यादा डर इस बात का था कि अगर मैंने कह दिया और तुमने मुझसे बात करना बंद कर दिया तो?

इसलिए मैंने चुप रहना चुना। आज सोचता हूँ तो लगता है कि शायद मैं कायर था। लेकिन तब मुझे लगता था कि तुम्हारी दोस्ती खोने से बेहतर है कि मैं अपनी मोहब्बत छिपाकर रखूँ।

तुम्हारे लिए शायद हमारे साथ बिताए वे दिन मामूली होंगे, पर मेरे लिए नहीं।

 

आज भी कभी किसी चाय की दुकान पर बैठता हूँ और चाय में कम चीनी मांगता हूँ, तो तुम्हारी याद आती है।

बारिश होती है तो तुम्हारी बातें याद आती हैं।

और जब कोई बिना वजह हंसता है, तो मुझे तुम्हारी वही पुरानी हंसी सुनाई देती है।

शायद प्यार इसी का नाम है। किसी के जाने के बाद भी उसका छोटी-छोटी चीजों में रह जाना। मैंने तुम्हें कभी पाने की जिद नहीं की। शायद इसलिए नहीं कि मैं बहुत समझदार था। बल्कि इसलिए कि मुझे पता था कि प्यार किसी पर अधिकार जमाने का नाम नहीं है। तुम खुश हो, यही काफी है। मैंने तुम्हें कभी बताया नहीं कि तुम मेरे लिए क्या थीं और शायद अब बताने का कोई मतलब भी नहीं है। तुम्हारी जिंदगी में शायद मेरी कोई जगह नहीं है और यह ठीक है। हर अधूरी कहानी दुखद नहीं होती।

कुछ कहानियां इसलिए खूबसूरत रहती हैं क्योंकि वे पूरी नहीं होतीं। अगर कभी मेरी याद आए तो मुझे उसी लड़के की तरह याद करना जो तुम्हारे सामने बैठकर भी अपने दिल की बात नहीं कह पाया था। शायद यही मेरी सबसे बड़ी कमी थी। और शायद मेरी मोहब्बत भी।

अगर यह चिट्ठी कभी तुम्हारे हाथ लग जाए तो इसका जवाब मत देना। बस इतना समझ लेना कि किसी ने तुम्हें बहुत सच्चे मन से चाहा था और तुम्हें पाने से ज्यादा तुम्हारी खुशी की चिंता की थी। अब इस चिट्ठी को यहीं छोड़ता हूँ। तुम्हें भेजूंगा नहीं। जैसे बहुत सारी बातें तुम्हें कभी बताई नहीं। बस कागज पर लिखकर रख देता हूँ।

शायद किसी दिन इसे पढ़कर मैं खुद से कह सकूं, काश, उस दिन कह दिया होता।

तुम्हारा अमित।

 

उसने कलम रख दी। कमरे में फिर वही सन्नाटा था।

अमित ने चिट्ठी को एक बार शुरू से अंत तक पढ़ा।

फिर उसे मोड़ा। एक पुराने लिफाफे में रखा। लिफाफे के ऊपर नैना का नाम लिखने के लिए कलम उठाई।

लेकिन हाथ फिर रुक गया। कुछ सेकंड बाद उसने लिफाफा उठाया और उसे अलमारी के पुराने लकड़ी वाले खाने में रख दिया। जहां कॉलेज की वही कॉपी रखी थी।

वह उठा। खिड़की के पास गया। बारिश अब रुक चुकी थी। सड़क पर पानी जमा था और स्ट्रीट लाइट की रोशनी उसमें कांप रही थी। अमित ने खिड़की खोली। ठंडी हवा कमरे में आई। उसने गहरी सांस ली।

अजीब तरह से उसका मन हल्का लग रहा था।

नैना को कुछ पता नहीं चला था। न उसे कभी पता चलेगा। लेकिन शायद अब इसकी जरूरत भी नहीं थी।

कुछ प्रेम कहे जाने के लिए नहीं होते। कुछ प्रेम सिर्फ याद किए जाने के लिए होते हैं। अमित वापस मेज के पास आया। उसने लैंप बंद किया। कमरा अंधेरे में डूब गया।

अलमारी के भीतर वह चिट्ठी पड़ी रही।

 

एक ऐसी चिट्ठी, जिसमें एक आदमी ने अपने जीवन की सबसे सच्ची बात लिखी थी। लेकिन जिसे उसने कभी भेजा नहीं और शायद कभी भेजेगा भी नहीं।

क्योंकि कभी-कभी किसी को खो देने का डर इतना बड़ा होता है कि इंसान अपनी पूरी जिंदगी उसकी याद के साथ गुजार देता है। बिना शिकायत। बिना उम्मीद।

बस एक छोटे-से अफसोस के साथ काश, उस दिन कह दिया होता।

एक चिट्ठी थी, जो कभी भेजी नहीं गई और एक मोहब्बत थी, जो कभी कही नहीं गई।

 

समाप्त

 

कुंदन राज दत्ता “निश्छल”

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Muktika Sahityakar