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वो अधूरी मुलाकात और खामोशियां

Rekha Tomar • Superstar Writer • Sahitya Ratna

वो अधूरी मुलाकात और खामोशियां

जिंदगी के सफर में कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जिनका कोई मुकम्मल अंजाम नहीं होता, लेकिन उनकी यादें उम्र भर दिल के किसी कोने में धड़कती रहती हैं। उस दिन की शाम कुछ ऐसी ही थी, जब हम बरसों बाद आमने-सामने तो थे, लेकिन बीच की दूरियों ने जैसे जुबां पर ताले लगा दिए थे। आँखों में ढेर सारी कहानियाँ थीं, दिल में अनकहे अहसास थे, और होंठों पर सिर्फ एक अजीब सी खामोशी।

वह चाय की प्याली धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी और घड़ी की सुइयाँ मानो बहुत तेज़ भाग रही थीं। हम दोनों ने एक-दूसरे को देखने की कोशिश की, पर नजरें मिलते ही फिर से झुका लीं। उस वक्त शब्दों की जरूरत ही नहीं थी, क्योंकि वो सन्नाटा सब कुछ बयां कर रहा था जो हम कभी किसी से कह नहीं पाए। ऐसा लगा कि अगर आज कुछ बोल दिया, तो यह अधूरापन बिखर जाएगा, इसलिए उस खामोशी को ही हमने अपना सबसे बड़ा सहारा बना लिया।

आज भी जब उस अधूरी मुलाकात के पन्नों को पलटती हूँ, तो एक हसीन दर्द सीने में उतर आता है। यह सच है कि हर रिश्ता मंजिल तक नहीं पहुँच पाता, पर कुछ रिश्तों की खूबसूरती उनके अधूरेपन और उन खामोश लम्हों में ही छिपी होती है।

तय थीं दूरियां शायद, जो हर बात अनकही रह गई,

मुलाकात अधूरी सही, पर रूह में तेरी खुशबू बह गई।

— लेखिका रेखा तोमर

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Muktika Sahityakar