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दिल का रिश्ता

Rekha Tomar • Superstar Writer • Sahitya Ratna

दिल का रिश्ता

दिल का रिश्ता
रिश्ते केवल खून के या कागजों के मोहताज नहीं होते। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनकी डोर सीधे दिल से जुड़ी होती है, जो बिना किसी स्वार्थ और दिखावे के एक अदृश्य और मजबूत धागे से दो अजनबी दिलों को हमेशा के लिए बांध देते हैं। मैहर की व्यस्त गलियों के बीच एक छोटी सी दुकान से अपनी गृहस्थी की गाड़ी चला रहे जितेंद्र और रेखा का जीवन भी कुछ ऐसा ही था। दोनों का साथ केवल पति-पत्नी का नहीं था, बल्कि जीवन के हर उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे की सबसे बड़ी ताकत और रूहानी हमसफर का था ।
रेखा एक संवेदनशील लेखिका थीं, जिनकी दुनिया शब्दों, कहानियों और एहसासों के इर्द-गिर्द घूमती थी। उनके मन में हमेशा इंसानी रिश्तों की गहराई और उनकी खूबसूरती को बयां करने की एक अजीब सी छटपटाहट रहती थी। दूसरी ओर, जितेंद्र व्यावहारिक, शांत स्वभाव के और जमीन से जुड़े हुए इंसान थे। दोनों की शख्सियतें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं, ठीक वैसे ही जैसे किसी संगीत में अलग-अलग सुर मिलकर एक मधुर धुन पैदा करते हैं। दुकान की भागदौड़ भरी जिंदगी और घर की जिम्मेदारियों के बीच, दोनों ने कभी भी अपने बीच की समझ और अपनापन कम नहीं होने दिया ।
समय बीतता गया। उनके जीवन में खुशियों के साथ-साथ जिम्मेदारियों का दायरा भी बढ़ता गया। उनका बेटा अभय अब बड़ा हो रहा था, जिसकी पढ़ाई और भविष्य को लेकर दोनों के सपने ऊंचे थे। जीवन में कई बार आर्थिक तंगी और पारिवारिक संघर्षों के ऐसे दौर भी आए जब हौसला डगमगाने लगा, लेकिन जितेंद्र और रेखा का आपसी विश्वास कभी नहीं डगमगाया। जब भी रेखा लेखन में उलझकर थक जातीं, जितेंद्र का एक कप चाय के साथ हौसला बढ़ाने वाला यह कहना— “तुम अपनी कलम मत रुकने देना, बाकी सब मैं संभाल लूंगा”— रेखा के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होता था ।
एक दिन, जब रेखा अपनी किसी कहानी के प्लॉट को लेकर बहुत उलझन में थीं और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उस कहानी के मुख्य पात्र के दिलों के रिश्ते को कैसे परिभाषित किया जाए, तब जितेंद्र ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा, “रेखा, रिश्तों को परिभाषित करने के लिए बड़ी-बड़ी परिभाषाओं की जरूरत नहीं होती। रिश्ता तो वह है जो बिन कहे सब कुछ समझ ले। जैसे तुम्हारा और मेरा है, जहाँ शब्दों की जरूरत ही नहीं पड़ती।” जितेंद्र की इन साधारण सी बातों ने रेखा के मन के सारे कोहरे को छांट दिया। उन्हें अपनी कहानी का क्लाइमैक्स मिल गया। उन्होंने उस रात अपने दिल की गहराइयों से एक ऐसी कहानी रची, जो न सिर्फ पाठकों के दिलों को छू गई, बल्कि उनके अपने जीवन के गहरे सच को भी बयां करती थी ।

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सांसारिक जीवन की धूप-छांव के बीच, उनके इस रिश्ते में कभी कड़वाहट नहीं आई। वे एक-दूसरे की खामोशियां भी पढ़ लेते थे। वक्त के साथ जब उन्होंने अपनी नातिन ख्वाहिश की किलकारियां अपने घर में गूंजते देखीं, तो उन्हें महसूस हुआ कि जीवन का पहिया कितनी खूबसूरती से आगे बढ़ रहा है। पुराने संघर्ष अब सुनहरी यादों में बदल चुके थे, लेकिन उनके बीच का वह पहला जैसा अपनापन और निश्छल प्रेम आज भी ज्यों का त्यों था ।
एक शाम जब दोनों दुकान के काम से फार होकर घर के छोटे से बगीचे में बैठे थे, जहाँ तुलसी और करौंदे के पौधे अपनी भीनी-भीनी खुशबू बिखेर रहे थे, तब रेखा ने जितेंद्र की तरफ देखकर कहा, “अगर मुझे दोबारा जन्म मिले, तो मैं चाहूंगी कि मेरा हर जनम इसी सफर और इसी साथ के साथ हो।” जितेंद्र ने मुस्कुराकर उनका हाथ अपने हाथ में थाम लिया। उस एक खामोश स्पर्श में सारे जवाब आ गए थे। यह इस बात का प्रमाण था कि जब दो दिल आपस में जुड़ जाते हैं, तो दुनिया की कोई भी आंधी उस रिश्ते की नींव को हिला नहीं सकती। यह केवल एक सफर नहीं था, बल्कि दो रूहों का एक ऐसा पवित्र बंधन था, जो समय और दूरियों की हर सीमा से परे था ।
धूप में छांव सा है तेरा साथ,
दिल के रिश्ते कभी नहीं मांगते कोई जात।
— लेखिका रेखा तोमर

तारीख: 16 अक्टूबर 2026

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Muktika Sahityakar