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वो अधूरी मुलाक़ात और खामोशियाँ

कुंदन राज दत्ता "निश्छल" • Superstar Writer • Sahitya Ratna

वो अधूरी मुलाक़ात और खामोशियाँ

 

शहरों की भीड़ में कुछ लोग ऐसे मिलते हैं, जिनसे मिलने के लिए हम कभी निकले ही नहीं होते।

न कोई तय जगह होती है, न कोई तय समय। बस अचानक किसी स्क्रीन पर एक नाम दिखाई देता है, कुछ शब्द पढ़ने को मिलते हैं और फिर पता ही नहीं चलता कि कब वह अनजान इंसान हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन गया।

 

कभी-कभी रिश्तों की शुरुआत आवाज़ से नहीं, शब्दों से होती है।

और कुछ प्रेम कहानियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें प्रेम बहुत कुछ कहता है, लेकिन मिलना हमेशा अधूरा रह जाता है।

 

यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

 

रविवार की शाम थी।

कुंदन अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा लैपटॉप पर कुछ लिख रहा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। कमरे में पीली रोशनी जल रही थी और मेज पर रखी चाय कब की ठंडी हो चुकी थी।

 

कुंदन पेशे से लेखक था। या यूँ कहें कि वह लेखक बनने की कोशिश में लगा एक ऐसा आदमी था, जिसे अपने लिखे शब्दों पर भरोसा कम और उन्हें मिटा देने की आदत ज्यादा थी। उस दिन वह एक ऑनलाइन काव्य प्रतियोगिता में शामिल हुआ था।

प्रतियोगिता का विषय था, बारिश और इंतज़ार।

 

कुंदन ने अपनी कविता लिखी और जमा कर दी।

कुछ देर बाद उसने प्रतियोगिता के पेज पर प्रतिभागियों की कविताएँ पढ़नी शुरू कीं। तभी उसकी नजर एक कविता पर ठहर गई।

नाम था, श्रद्धा

कविता की आखिरी पंक्ति थी

 

“कुछ लोग बारिश की तरह होते हैं,

आते हैं तो भीगाकर चले जाते हैं,

और जाते हैं तो उम्र भर भीतर बारिश होती रहती है।”

 

कुंदन उस पंक्ति पर काफी देर तक रुका रहा।

उसने कविता दोबारा पढ़ी। फिर तीसरी बार।

उसे लगा जैसे किसी ने उसके भीतर की कोई ऐसी बात लिख दी हो, जिसे वह खुद कभी शब्द नहीं दे पाया था।

उसने कमेंट किया, आखिरी दो पंक्तियाँ बहुत देर तक याद रहेंगी।

कुछ मिनट बाद जवाब आया, कभी-कभी आखिरी पंक्तियाँ ही पूरी कहानी कह जाती हैं।

 

कुंदन मुस्कुराया। उसने फिर लिखा, लेकिन आपकी कविता की कहानी पूरी नहीं लगी।

उधर से जवाब आया, हर कहानी पूरी हो जाए तो शायद कविता लिखने की जरूरत ही न पड़े।

 

कुंदन पहली बार थोड़ा गंभीर हुआ।

उसे लगा, सामने वाली लड़की सिर्फ कविता नहीं लिखती, शब्दों के पीछे कुछ छुपाती भी है।

उसने मोबाइल उठाया और निजी मैसेज भेज दिया।

आपने बहुत अच्छा लिखा है।

कुछ देर कोई जवाब नहीं आया। कुंदन बहुत देर तक मैसेज का इंतजार किया लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

फिर रात करीब ग्यारह बजे श्रद्धा का मैसेज आया, धन्यवाद। आपने भी बहुत अच्छा लिखा है।

बस इतना ही।

कुंदन ने सोचा, बातचीत यहीं खत्म हो जाएगी।

लेकिन शायद कुछ मुलाकातें खत्म होने के लिए नहीं होतीं।

 

अगले दिन प्रतियोगिता का परिणाम आया।

कुंदन दूसरे स्थान पर था और श्रद्धा पहले।

कुंदन ने उसे बधाई दी।

श्रद्धा ने जवाब दिया, आपको भी बधाई। दूसरे स्थान पर आना बुरा नहीं है।

कुंदन ने मजाक में लिखा, अब अगली प्रतियोगिता में आपको हराना पड़ेगा।

श्रद्धा का जवाब आया, कोशिश कर लीजिए। लेकिन हार गए तो बहाना नहीं चलेगा।”

 

यहीं से दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई। पहले कविता तक सीमित बातें थीं। फिर किताबों तक पहुँचीं। फिर पसंदीदा लेखक। फिर बारिश। फिर चाय। फिर बचपन और देखते-देखते रात के बारह बजे की बातचीत दो बजे तक पहुँचने लगी।

 

श्रद्धा पटना में रहती थी और कुंदन बनारस में।

दोनों ने एक-दूसरे को कभी देखा नहीं था।

न कोई तस्वीर मांगी थी, न वीडियो कॉल की थी।

अजीब बात थी कि वे एक-दूसरे को जाने बिना भी बहुत कुछ जानने लगे थे।

 

श्रद्धा को पता था कि कुंदन चाय में चीनी कम लेता है।

और कुंदन को पता था कि श्रद्धा को बारिश पसंद है लेकिन भीगना नहीं। कुन्दन को यह भी पता था कि श्रद्धा रात में लिखते समय धीमी आवाज में पुराने गाने सुनती है।

 

श्रद्धा जानती थी कि कुंदन लिखते समय बार-बार पेन की टोपी खोलता और बंद करता है।

उसे पता था कि कुंदन को सुबह जल्दी उठना बिल्कुल पसंद नहीं।

उसे यह भी पता था कि कुंदन जब परेशान होता है तो ज्यादा लिखता है।

 

एक रात श्रद्धा ने पूछा, आप इतना लिखते क्यों हैं?

कुंदन ने काफी देर बाद जवाब दिया, क्योंकि जो बातें लोगों से नहीं कह पाता, वो कागज से कह देता हूँ।

श्रद्धा ने लिखा, तो फिर मै?

कुन्दन ने स्क्रीन को देखा। उंगलियाँ कुछ देर कीबोर्ड पर रुकी रहीं। फिर उसने लिखा, आपसे तो कह देता हूँ।

 

उस मैसेज के बाद काफी देर तक श्रद्धा का कोई जवाब नहीं आया।

कुंदन को लगा शायद उसने कुछ ज्यादा कह दिया।

करीब दस मिनट बाद सिर्फ एक मैसेज आया, अच्छा है।

बस दो शब्द।

लेकिन उन दो शब्दों में जाने कितनी बातें थीं।

 

समय बीतता गया दोनों की सुबह एक-दूसरे के मैसेज से शुरु होती थी।

 

उठ गए?

हाँ।

नाश्ता किया?

आपने किया?

 

कभी-कभी बात इतनी ही होती। लेकिन दोनों जानते थे कि यह सिर्फ पूछना नहीं था। यह एक-दूसरे की जिंदगी में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना था।

 

एक दिन श्रद्धा ने पूछा, अगर हम कभी मिले तो?

 

कुंदन ने हँसते हुए लिखा, तो पहले कॉफी।

श्रद्धा, चाय।

कुंदन, आप कॉफी नहीं पीतीं?

श्रद्धा, आपसे मिलने के लिए अपनी पसंद बदल सकती हूँ।

 

कुंदन काफी देर तक उस मैसेज को देखता रहा।

उसने पहली बार महसूस किया कि शायद यह दोस्ती से आगे निकल चुका है। उसे श्रद्धा की आदत हो चुकी थी।

श्रद्धा के बिना दिन थोड़ा खाली लगता। उसके मैसेज का इंतजार रहने लगा था। उसके “गुड नाइट” के बिना नींद नहीं आती थी।

 

एक रात कुंदन ने लिख दिया, श्रद्धा, मुझे लगता है मैं आपसे प्यार करने लगा हूँ।

मैसेज भेजने के बाद उसका दिल बहुत तेज धड़कने लगा। वह स्क्रीन को देखता रहा।

एक मिनट।

पाँच मिनट।

दस मिनट।

फिर स्क्रीन पर लिखा आया

मुझे डर था कि एक दिन आप ये कहेंगे।

कुंदन का दिल बैठ गया।

उसने पूछा, क्यों?

 

काफी देर बाद जवाब आया, क्योंकि मैं भी आपसे प्यार करने लगी हूँ।

 

उस रात दोनों ने बहुत कम बातें कीं। शायद इसलिए नहीं कि कहने को कुछ नहीं था। बल्कि इसलिए कि कहने के लिए बहुत कुछ था।

 

अब उनके बीच प्यार था। लेकिन एक अजीब तरह का प्यार। जिसमें हाथ पकड़ना नहीं था। एक-दूसरे के सामने बैठना नहीं था। एक-दूसरे की आँखों में देखकर मुस्कुराना नहीं था। बस शब्द थे। आवाजें थीं। इंतजार था और एक अदृश्य रिश्ता था।

 

कुंदन अक्सर कहता, एक दिन अचानक तुम्हारे सामने आ जाऊँगा।

 

श्रद्धा हँसकर कहती, पहले बता देना। अचानक आने वालों से मुझे डर लगता है।

कुंदन पूछता, मुझसे भी?

 

श्रद्धा का जवाब आता, तुमसे नहीं। तुम्हारे सामने खुद को संभाल नहीं पाऊँगी, उससे डर लगता है।

कुंदन मुस्कुरा देता।

उसे लगता था कि अब उनकी मुलाकात बस समय की बात है। लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी योजनाओं के मुताबिक नहीं चलती।

 

 

एक दिन श्रद्धा का मैसेज नहीं आया। अभय ने सोचा व्यस्त होगी। अगले दिन भी नहीं आया।

उसने पूछा, सब ठीक है?

कोई जवाब नहीं। तीसरे दिन उसने फोन किया। फोन बंद था। कुंदन बेचैन हो गया।

उसने प्रतियोगिता वाली वेबसाइट पर श्रद्धा की प्रोफाइल देखी। वहाँ भी कई दिनों से कोई गतिविधि नहीं थी। उसे समझ नहीं आया क्या करे। उसके पास श्रद्धा का घर का पता नहीं था। उसके परिवार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। वह बस इतना जानता था कि वह पटना में रहती है और लेखन करती है।

 

पाँचवें दिन रात को मैसेज आया, माफ करना।

 

कुंदन ने तुरंत जवाब दिया, कहाँ थीं?

श्रद्धा का जवाब कुछ देर बाद, घर में थोड़ी परेशानी थी।

कुंदन, तुम ठीक हो?

श्रद्धा,, हाँ।

कुंदन, मुझे बहुत चिंता हुई।

बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर श्रद्धा ने लिखा, कुंदन अगर कभी मैं तुमसे दूर हो जाऊँ तो?

कुंदन ने तुरंत लिखा, ऐसा मत कहना।

श्रद्धा, बस पूछ रही हूँ।

कुंदन, तो मेरा जवाब है, मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा।

श्रद्धा ने सिर्फ इतना लिखा, कुछ चीजें हमारे हाथ में नहीं होतीं।

 

उस रात पहली बार दोनों के बीच खामोशी आई। ऐसी खामोशी जिसमें दोनों ऑनलाइन थे। दोनों कुछ लिखना चाहते थे। लेकिन दोनों के पास शब्द नहीं थे।

 

कुछ दिन बाद श्रद्धा ने खुद मिलने की बात की।

अगले महीने मैं बनारस आ रही हूँ।

कुंदन ने मैसेज पढ़ा और कई बार पढ़ा।

 

उसने लिखा, सच?

श्रद्धा, हाँ।

कुंदन, कब?

श्रद्धा, 18 तारीख।

 

कुंदन ने कैलेंडर देखा। अभी सत्रह दिन बाकी थे। उसे लगा जैसे सत्रह दिन सत्रह साल हो गए हों। उसने तुरंत मिलने की जगह तय की।

दशाश्वमेध घाट। शाम पाँच बजे।

श्रद्धा ने कहा, बहुत भीड़ होगी।

कुंदन, तो अस्सी घाट?

श्रद्धा, नहीं। दशाश्वमेध ही ठीक है।

 

फिर श्रद्धा ने लिखा, कुंदन, अगर मैं सामने आकर कुछ न बोल पाऊँ तो?

कुंदन ने जवाब दिया, मैं तुम्हारी खामोशी सुन लूँगा।

श्रद्धा ने एक दिल भेज दिया।

उस रात कुंदन बहुत खुश था। उसने पहली बार आईने के सामने खड़े होकर सोचा कि श्रद्धा उसे देखकर क्या कहेगी।

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वह सोचता रहा, क्या वह पहले हाथ मिलाएगा या बस मुस्कुराएगा? क्या वह उसे गले लगा पाएगा? या दोनों कुछ देर चुप खड़े रहेंगे?

 

उसने अगले सत्रह दिनों के लिए कई योजनाएँ बना लीं। एक छोटी सी डायरी खरीदी। श्रद्धा के लिए एक किताब और एक नीली स्याही वाला पेन।

उसे याद था कि श्रद्धा नीली स्याही से लिखना पसंद करती है।

 

18 तारीख आ गई। सुबह से ही कुंदन बेचैन था। बार-बार फोन देखता। श्रद्धा का मैसेज नहीं आया था।

दोपहर में उसने लिखा, कहाँ तक पहुँची?

कोई जवाब नहीं।

 

चार बजे फिर लिखा, मैं घाट पर हूँ।

 

पाँच बज गए।

छह बज गए।

सात बज गए।

 

दशाश्वमेध घाट पर शाम उतर चुकी थी। गंगा के किनारे आरती की तैयारी शुरू हो गई थी। कुंदन की आँखें भीड़ में लगातार किसी चेहरे को खोज रही थीं।

हर लड़की उसे कुछ क्षण के लिए श्रद्धा जैसी लगती।

वह किसी को देखता, फिर नजरें झुका लेता।

साढ़े सात बजे उसने आखिरी मैसेज भेजा, श्रद्धा तुम ठीक हो?

 

कोई जवाब नहीं। आठ बजे तक वह वहीं बैठा रहा।

फिर घर लौट आया। उस रात उसने फोन तकिए के पास रखकर सोने की कोशिश की। लेकिन नींद नहीं आई।

रात करीब दो बजे फोन की स्क्रीन जली।

श्रद्धा का मैसेज था, माफ कर देना।

 

कुंदन की आँखें भर आईं। उसने तुरंत लिखा, तुम आई क्यों नहीं?

काफी देर तक कोई जवाब नहीं।

फिर श्रद्धा ने लिखा, मैं आई थी।

कुंदन ने चौंककर लिखा, क्या?

श्रद्धा, मैं घाट पर थी।

कुंदन, तो मेरे पास क्यों नहीं आई?

लंबी खामोशी।

 

फिर मीरा का मैसेज आया, मैं तुम्हें दूर से देख रही थी।

कुंदन कुछ समझ नहीं पाया, उसने पूछा कहाँ से?

श्रद्धा, तुम नीली शर्ट में थे।

कुंदन का दिल एक पल के लिए रुक सा गया।

वह उसी नीली शर्ट में गया था जो श्रद्धा ने एक बार मजाक में कहा था कि उस पर अच्छी लगेगी।

 

उसने लिखा, फिर सामने क्यों नहीं आई?

बहुत देर बाद जवाब आया, क्योंकि तुम्हें देखकर लगा कि अगर सामने आ गई तो वापस जाना मुश्किल हो जाएगा।

कुंदन ने फोन कसकर पकड़ लिया और जवाब लिखा, तो चली क्यों गईं?

इस बार जवाब आने में बहुत समय लगा।

श्रद्धा, क्योंकि मुझे जाना ही था।

कुंदन, कहाँ?

कोई जवाब नहीं।

कुंदन ने फिर लिखा, श्रद्धा?

एक लम्बी खामोशी।

फिर अचानक कुंदन, क्या तुम मुझे मेरी खामोशी के साथ स्वीकार कर पाओगे?

कुंदन ने बिना सोचे लिखा, तुम्हारी खामोशी भी मेरी है।

उसके बाद श्रद्धा ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

अगले दिन उसका फोन बंद था। फिर अगले दिन भी। फिर अगले सप्ताह भी।

कुंदन ने उसके पुराने मैसेज पढ़ने शुरू कर दिए।

हर रात। कभी उनकी पहली बातचीत। कभी वह कविता।

कभी मैं भी तुमसे प्यार करने लगी हूँ। कभी मिलने की बात और कभी, कुछ चीजें हमारे हाथ में नहीं होतीं।

 

धीरे-धीरे कुंदन समझने लगा कि श्रद्धा उससे कुछ छुपा रही थी। लेकिन क्या? उसके पास कोई जवाब नहीं था।

उसने प्रतियोगिता की वेबसाइट पर मीरा की पुरानी कविताएँ पढ़नी शुरू कीं।

 

एक कविता में उसे एक पंक्ति मिली

“कुछ यात्राएँ मंजिल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं,

कुछ यात्राएँ सिर्फ यह बताने आती हैं कि रास्ते में कोई अपना था।”

 

कुंदन की आँखें भर आईं।

उसने पहली बार महसूस किया कि शायद श्रद्धा पहले से जानती थी कि उनका साथ ज्यादा लंबा नहीं होगा।

 

करीब तीन महीने बाद कुंदन के पास एक लिफाफा आया।

 

भेजने वाले का नाम नहीं था। अंदर एक किताब थी।

वही किताब जो उसने श्रद्धा के लिए खरीदी थी।

कुंदन के हाथ काँपने लगे। किताब के बीच में एक कागज रखा था।

उस पर लिखा था

कुंदन

तुमने मुझे यह किताब देने के लिए खरीदी थी।

मैं इसे लेने नहीं आ सकी, इसलिए वापस तुम्हें भेज रही हूँ।

शायद यह तुम्हारे पास ही रहनी चाहिए।”

 

नीचे श्रद्धा का नाम था।

 

कुंदन ने पत्र आगे पढ़ा।

 

मैंने तुमसे बहुत कुछ छुपाया।

इसलिए नहीं कि मैं तुम पर भरोसा नहीं करती थी, बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती थी।

 

मेरी बीमारी बहुत पुरानी थी। डॉक्टरों ने कहा था कि इलाज लंबा चलेगा और शायद मैं ठीक हो जाऊँ। मैंने खुद भी भरोसा किया था। इसलिए जब तुम मेरी जिंदगी में आए तो मैंने सोचा कि शायद जिंदगी मुझे एक और मौका दे रही है।

तुमसे बात करते-करते मुझे लगा कि मैं सच में जी रही हूँ।

तुम्हें शायद याद होगा, तुम हमेशा कहते थे कि मैं तुम्हें अपनी खामोशी समझने देती हूँ। सच यह है कि मैं तुम्हारी आवाज में अपनी जिंदगी सुनती थी।

उस दिन बनारस आई थी। तुम्हें दूर से देखा। तुम सच में वैसे ही थे जैसे मैंने कल्पना की थी। नीली शर्ट में। बेचैन। बार-बार फोन देखते हुए।

मैं चाहती थी कि तुम्हारे सामने जाकर कह दूँ, ‘कुन्दन, मैं आ गई।’

 

लेकिन मेरे साथ मेरी बीमारी भी थी।

मुझे डर लगा कि अगर मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ लिया तो शायद उसे छोड़ने की हिम्मत कभी नहीं होगी। इसलिए चली गई। तुमने पूछा था कि अगर मैं कभी दूर हो गई तो क्या करोगे?

तुमने कहा था, तुम्हें जाने नहीं दूँगा। काश, मैं तुम्हारी इस बात को सच कर पाती।

मुझे नहीं पता मेरे पास कितना समय है। लेकिन जितना भी है, उसमें मैं चाहती हूँ कि तुम्हें मेरी वजह से सिर्फ दुख न मिले। तुम लेखक हो। शायद तुम इस अधूरी कहानी को पूरा कर सको। लेकिन एक बात जरूर करना, मुझे कहानी में मरने मत देना।

मुझे वहीं रखना जहाँ दो लोग एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं, लेकिन मिल नहीं पाते।

क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ मिलकर नहीं, अधूरी रहकर भी पूरी हो जाती हैं।

 

तुम्हारी,

श्रद्धा।

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कुंदन बहुत देर तक उस पत्र को पकड़े बैठा रहा। उस रात उसने कुछ नहीं लिखा। पहली बार उसके पास शब्द नहीं थे। अगले कई दिनों तक वह सिर्फ चुप रहा।

उसने प्रतियोगिताएँ छोड़ दीं। कविता लिखना छोड़ दिया।

सोशल मीडिया से दूरी बना ली। लोगों ने पूछा, क्या हुआ?

वह सिर्फ मुस्कुरा देता। किसी को क्या बताता कि एक इंसान, जिससे वह कभी मिला ही नहीं था, उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका था।

करीब दो महीने बाद एक शाम उसके फोन पर एक ईमेल आया।

 

भेजनें वाली थी, श्रद्धा की बहन। मैसेज बहुत छोटा था।

 

दीदी नहीं रहीं। जाने से कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि अगर कभी आपको मेरा ईमेल मिले तो उन्हें माफ कर देना। उन्होंने आपकी बहुत बातें की थीं। कहा था कि आप उन्हें दुखी नहीं होने देते थे। धन्यवाद।

 

कुंदन ने ईमेल पढ़ा। फिर मोबाइल बंद कर दिया। वह खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर बारिश हो रही थी। उसे अचानक उनकी पहली कविता याद आई।

कुछ लोग बारिश की तरह होते हैं…

 

उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसने पहली बार श्रद्धा को सिर्फ खोया नहीं था। उसने महसूस किया कि वह उसे कभी पा ही नहीं सका था और शायद यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी थी।

 

एक साल बाद कुंदन ने अपनी नई किताब प्रकाशित की।

किताब का नाम था, “वो अधूरी मुलाक़ात और खामोशियाँ”

 

पहले पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था

 

“उस लड़की के नाम, जिसने मुझे शब्दों से प्रेम करना सिखाया और खामोशी का अर्थ समझाया।”

 

किताब की पहली कहानी वही थी। ऑनलाइन काव्य प्रतियोगिता। एक कविता। दो अनजान लोग।

धीरे-धीरे बढ़ती बातचीत। बिना मिले हुआ प्रेम और दशाश्वमेध घाट की वह शाम।

 

किताब के आखिरी पन्ने पर कुंदन ने श्रद्धा की वही पंक्ति लिखी

“कुछ प्रेम कहानियाँ मिलकर नहीं, अधूरी रहकर भी पूरी हो जाती हैं।”

 

किताब बहुत पढ़ी गई।

लोगों ने कहा, कितनी खूबसूरत प्रेम कहानी है।

किसी ने पूछा, क्या यह सच है?

 

कुंदन मुस्कुराकर कहता, हर लेखक अपनी कहानियों में थोड़ा-सा सच छुपा देता है।

लेकिन एक बात वह किसी को नहीं बताता था की वाह हर साल 18 तारीख को वह दशाश्वमेध घाट जाता था।

शाम पाँच बजे। वही जगह। वही किनारा। कभी-कभी वह अपने साथ नीली स्याही वाला पेन भी ले जाता।

गंगा की ओर देखकर कुछ देर चुप बैठता। फिर अपनी डायरी खोलकर लिखता, श्रद्धा आज फिर तुमसे मिलने आया था।

फिर कुछ देर रुकता और नीचे लिखता

तुम आई नहीं।

 

फिर मुस्कुराकर पन्ना बंद कर देता। क्योंकि अब उसे पता था, कुछ इंतजार खत्म होने के लिए नहीं होते। वे जिंदगी भर साथ चलने के लिए होते हैं।

उस शाम भी गंगा बह रही थी। आरती की घंटियाँ बज रही थीं। लोग अपने-अपने घरों को लौट रहे थे।

कुंदन वहीं बैठा था। उसने आँखें बंद कीं। उसे लगा जैसे कोई बहुत धीमी आवाज उसके पास आकर कह रही हो कुंदन

 

उसने आँखें खोल दीं। सामने कोई नहीं था। सिर्फ हवा थी और गंगा के पानी पर तैरती एक छोटी-सी नाव।

कुंदन मुस्कुराया।

उसने अपनी डायरी में आखिरी पंक्ति लिखी

 

“हमारी मुलाक़ात अधूरी थी, श्रद्धा,

लेकिन तुम्हारी खामोशी ने मेरी पूरी जिंदगी लिख दी।

 

उसने डायरी बंद की। आसमान में बादल घिर आए थे।

बारिश शुरू होने वाली थी। कुंदन धीरे-धीरे घाट की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा और उसके पीछे गंगा वैसे ही बहती रही, बिना कुछ कहे। बिल्कुल श्रद्धा की तरह।

 

खामोश…

लेकिन बहुत कुछ कहती हुई।

 

समाप्त

 

कुंदन राज दत्ता “निश्छल”

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Author

Muktika Sahityakar