“काश…… एक अधूरी प्रेम कहानी “
**काश… उस दिन तुम रुक जाते**
बारिश की उस शाम स्टेशन पर भीड़ थी, मगर नैना के लिए जैसे पूरा संसार ठहर गया था। छतरी के नीचे खड़ी वह बार-बार उसी रास्ते को देख रही थी, जहाँ से आरव को आना था।
हाथ में उसकी वही पुरानी चिट्ठी थी, जिसके आखिरी शब्द आज भी नैना के दिल में साँस लेते थे—
*”नैना, अगर तुम कह दो तो मैं सब कुछ छोड़कर तुम्हारे साथ चल दूँगा…”*
नैना ने तब भी कुछ नहीं कहा था।
कहती भी तो कैसे?
घर में पिता की बीमारी, माँ की जिम्मेदारियाँ और छोटी बहन की शादी—हर जिम्मेदारी उसके प्रेम के सामने एक ऊँची दीवार बनकर खड़ी थी। आरव ने बहुत इंतजार किया, मगर नैना की खामोशी को उसने शायद इंकार समझ लिया।
उस दिन वह शहर छोड़कर चला गया। जाते-जाते उसने सिर्फ इतना कहा था, “कभी तुम्हें लगे कि मुझे रोकना चाहिए था… तो समझ लेना, मैं तुम्हारा इंतजार करता रहा।”
“बच्चे बड़े हों गए….. अब मैं कहाँ हूँ??”
नैना ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की थी… मगर सिर्फ अपने मन में। होंठों तक आया एक शब्द—‘रुक जाओ’—जिम्मेदारियों के बोझ तले फिर से दब गया।
कई साल गुजर गए।
नैना की शादी हुई, बच्चे हुए, जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती रही। आरव भी अपनी दुनिया में कहीं बस गया। मगर कुछ रिश्ते जीवन से चले जाने के बाद भी स्मृतियों में नहीं, धड़कनों में बसे रहते हैं।
आज अचानक खबर मिली कि आरव इसी शहर में है। वर्षों बाद वही शहर, वही स्टेशन और शायद वही अधूरा सवाल उसके सामने खड़ा था।
वही स्टेशन… वही बारिश… और वही इंतजार।
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी।
लोग उतरने लगे।
फिर वह दिखाई दिया।
बालों में सफेदी उतर आई थी, चेहरे पर उम्र की कुछ लकीरें थीं, लेकिन आँखें वही थीं।
दोनों आमने-सामने खड़े थे।
नैना कुछ कहती, उससे पहले आरव मुस्कुराया।
“कैसी हो?”
नैना ने भी मुस्कुराने की कोशिश की।
“ठीक हूँ… तुम?”
“मैं भी।”
बस दो शब्दों के बीच एक पूरी जिंदगी खामोश खड़ी रही।
आरव ने जेब से एक पुराना, तह किया हुआ कागज निकाला।
“तुम्हारी चिट्ठी… आज भी संभालकर रखी है।”
नैना का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मैंने तुम्हें कभी चिट्ठी नहीं भेजी थी।”
आरव ने कागज उसकी ओर बढ़ाया।
वह वही चिट्ठी थी… जो नैना ने वर्षों पहले लिखी थी, मगर भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी।
आरव ने कागज उसकी हथेली पर रखते हुए धीमे से कहा, “शायद… उस दिन भेज देतीं तो हमारी कहानी कुछ और होती।”
नैना की आँखों से एक आँसू चुपचाप गिर पड़ा।
सीटी बजी। ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी।
आरव मुड़ा, एक पल उसे देखा और फिर भीड़ में खो गया।
नैना वहीं खड़ी रही।
नैना वहीं खड़ी रही। उसके हाथ में वह पुरानी चिट्ठी थी और आँखों के सामने एक पूरा अतीत। आज उसे समझ आया कि कुछ प्रेम कहानियाँ इसलिए अधूरी नहीं होतीं कि उनमें प्रेम कम था…
बल्कि इसलिए अधूरी रह जाती हैं क्योंकि “कभी-कभी दो लोग एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं, मगर सही समय पर अपने दिल की बात कह नहीं पाते। और जिंदगी… सही समय लौटाकर नहीं देती।”
बारिश उसके चेहरे पर गिर रही थी। नैना ने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा—
“काश… उस दिन मैं एक बार कह देती—रुक जाओ। शायद हमारा प्रेम अधूरा न होता… शायद हमारी कहानी का अंत ही न लिखा जाता।”
स्वरचित ✍🏼
स्वीटी श्रीवास्तव
वाराणसी
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Agar Sweety Srivastava ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:









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