सपनों की उड़ान बहुत ऊँची होती है और एक दिन वह अपने मकसद पर जरूर पहुँचती है, बशर्ते वह खुली आँखों से देखी गयी सपनों की उड़ान होनी चाहिए। बंद आँखों से देखे गए सपनों की उड़ान बस सपनों की बनकर ही रह जाती है और असल ज़िंदगी में कुछ हासिल नहीं कर पाती।
सपने देखना अच्छी बात है और उन्हें उड़ान देना उससे भी अच्छी बात है। बस उस सपने को उड़ान देने के लिए हमें मेहनत भी उतनी ही करनी चाहिए। तभी तो हम अपने सपनों को उड़ान दे सकेंगे। वरना ये सपने कभी उड़ान नहीं भर पाएंगे और जिन्दगी भर सिर्फ सपने ही रह जाएंगे।
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सपनों की उड़ान: गाँव की सुनीता का बड़ा सपना
सुनीता एक छोटे से गाँव में रहती थी और कक्षा पाँच में पढ़ती थी। उसके माता-पिता एक किसान थे और उसके दो छोटे भाई भी थे।
सुनीता पढ़ने में बहुत तेज थी। उससे जब कोई पूछता कि वह आगे चलकर क्या काम करेगी? तो वह पूरे आत्मविश्वास से बोलती, “मैं तो डॉक्टर बनूँगी और सबका इलाज करुँगी।”
सभी लोग उसकी बात पर हँस देते और सोचते कि ये इस गाँव से कभी बाहर भी जा पायेगी या नहीं, इसे नहीं पता, और सपने डॉक्टर बनने के देखती है! बेचारी सुनीता उनकी बात समझ तो नहीं पाती, बस इतना जरूर समझ जाती कि ये लोग उसका मज़ाक बना रहे हैं।
फिर वह उदास होकर अपने बाबा से पूछती, “बाबा, क्या मैं कुछ गलत बोलती हूँ जो सब लोग मेरा मज़ाक बनाते हैं?”
मेहनत के बिना सपने सच नहीं होते
बाबा उसे प्यार से समझाते, “नहीं बेटा, तुम कुछ गलत नहीं सोचती हो। सपनों को उड़ान तो देनी पड़ेगी ना, तभी तो वो सच हो पाएंगे।”
बाबा ने सुनीता को आगे समझाया, “अगर तुम्हें अपने सपनों को सच करना है, तो उसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी। खाली सपने देखने से सपने पूरे नहीं होते हैं। उन्हें पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।”
सुनीता ने अपने बाबा से वादा किया कि वह खूब मेहनत करेगी और अपने सपने को पूरा करेगी। जब सुनीता ने बारहवीं कक्षा प्रथम श्रेणी (First Division) में उत्तीर्ण की, तो उस समय उसके सपनों की उड़ान को उसके बाबा ने असली पंख दिए। उन्होंने उसे कुछ दिनों के लिए शहर अपनी बुआ के घर भेज दिया, जहाँ वह मेडिकल की परीक्षा की तैयारी कर सके।
सच्ची लगन और सपनों की उड़ान
सुनीता पढ़ने में तो होशियार थी ही, तो थोड़ा सा मार्गदर्शन मिल जाने से उसने मेडिकल की प्रवेश परीक्षा पास कर ली। जब उसने यह परीक्षा उत्तीर्ण की, तब उसके बाबा ने उसे फिर से समझाया:
“बेटा, ये तेरे सपने की उड़ान की बस शुरुआत है। अभी तुझे बहुत मेहनत करनी है, अपने सपने को ऊँची उड़ान देने के लिए। क्योंकि बिना मेहनत के सपने कभी उड़ान नहीं भरते हैं।”
सुनीता ने अपने बाबा को वचन दिया कि वह अपने सपने को कभी भी गिरने नहीं देगी, उसे हमेशा ऊँची उड़ान देगी। और अंततः उसने वह सच कर दिखाया। वह डॉक्टर बनकर ही अपने गाँव वापस आयी।
निष्कर्ष: सपनों की उड़ान को दिशा देना बहुत जरूरी है। तभी उन्हें पूरा करने के लिए हम सच्ची मेहनत भी करेंगे। क्योंकि बिना मेहनत के सपने कभी मंज़िल तक नहीं पहुँचते।
धन्यवाद 🙏
लेखिका: भावना भट्ट
(प्रस्तुति नंबर – 18, शनिवार, 8-8-26)
स्वरचित और मौलिक रचना






