तोंदू जी की तोंद मटके जैसे गोल हास्य कविता

*शीर्षक,,, तोंदू जी की तोंद मटके जैसे गोल,:-*
*हास्य कविता:-*
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तोंदु जी की तोंद हे या अलमारी,
या लगी तुम्हें भी इश्कि बीमारी ।

हंसते हंसते ये तोंदू हो गई भारी ,
तभी हास्य व्यंग करे दुनिया सारी ।

ये दादी के मटके जैसे गोल हैं,
देखो बीच में मची हुई पोल है।

मतवाली चाल पे घेवर सी तोंद डोले भारी,
तोदु जी चले तो लगे ढोल पे थिरक रहे, हंसे दुनिया सारी ।

इनकी रसगुल्ले सी आंखें गोल,
बड़े पाव से गद्देदार गाल गोल-गोल ।

देखो इनके चमचम जैसे दांत निराले,
तोंदू जी के नारंगी से होठ मतवाले ।

देख के इनको एटम बम सी फटे हंसी हमारी,
तोंदू जी बार-बार रोटी सी फुलाते थे तोंद बेचारी ।

तोंदू जी की अब तो तोंद बनी बेहाल है,
ये सब तोंदू जी की चटोरी जीभ का कमाल है।

टकली टाट सीधी सड़क पान की है दुकान,
देखने को उमड़ी जिन्हें भीड़ अनजान ।

तोंदू जी के जीवन की कमाई तोंद में समाई,
एक हंसी के पात्र सी दुकान है सजाई ।

सफेद कुर्ता, सफेद पजामा पे चमके बन्डी काली,
नेताजी से भाषण देते,बात करें मतवाली ।

एक बारात में तोंदू जी पहुंचे पहलवान,
गपागप दबा-दबा के खाने लगे पकवान ।

लोगों की हंसी का उन पे कोई असर नहीं यारों,
कल मिले ना मिले आज तो जी भर के खालो।
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नाम शिवा सिंहल आबुरोड राजस्थान से

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शिवा सिंहल

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