बहाना तो है नहीं- ग़ज़ल
जीने का कोई अपना बहाना तो है नहीं,
पर बिन जिए जहाँ से यूँ जाना तो है नहीं।
बाती की उम्र ही है रोशनी की जिंदगी,
पर रोशनी का कोई ठिकाना तो है नहीं।
सबकी है अपनी सोच, यहाँ आदतें भी हैं,
बेबात की हर बात सताना तो है नहीं।
अपने नज़र खुदी की बहतरी को सौंप दी,
जब आई ना जहाँ को दिखाना तो है नहीं।
बहने लगा अब कलम से सब्र का लहू,
बहने दो, कोई राज छुपाना तो है नहीं।
चढ़ जाएगा बुखार, ज़रा एहतियात लो,
कागज़ की कश्तियों का ज़माना तो है नहीं।
कोशिश में सुलझने की उलझ न ना तुम क्षमा,
शक का कोई भी छोर सिराना तो है नहीं।
— क्षमा उर्मिला
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