कविता का खेत

सजाने निकला था मैं अपना कविता का खेत,
उगाने निकला था उसमें सपनों का एक खेत।

चाहत थी हर शब्द में खुशबू सी घुल जाए,
मगर उग आई जाने क्यों काँटों की एक लता खेत।

सींचा था भावों को मैंने बड़ी मोहब्बत से,
फिर भी दर्द ही दर्द मिला हर तरफ़ मेरे खेत।

मैंने तो चाहा था फूलों से महक उठे मन,
हवा न जाने कहाँ से लाई पतझड़ का रेत।

कलम को समझाया—ज़रा प्रेम से लिखना,
वो लिख गई आँखों में छुपा हुआ हर खेद।

अब काट रहा हूँ धीरे-धीरे उन काँटों को,
शायद फिर खिल उठे कोई फूल मेरे खेत।

हार नहीं मानूँगा इन कंटीली राहों से,
क्योंकि उम्मीद अभी भी रखती है मेरा खेत।

कवि ~ नवीन कुमार लववंशी

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