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अधूरी ही ठीक लगती है…

कुंदन राज दत्ता "निश्छल" • Superstar Writer • Sahitya Ratna

अधूरी ही ठीक लगती है…

मोहब्बत अधूरी ही ठीक लगती है,
मुकम्मल हो जाने पर मोहब्बत कहाँ रहती है।

वह जो एक अधूरापन है दरमियां,
वही तो ज़िंदा रखता है दास्ताँ,
जो मिल गए तुम और हम मुकम्मल होकर,
तो ढल जाएगी इस इश्क़ की जवां सुब्ह-ओ-शाम।

पा लेने की चाह में जो तड़प है बाकी,
उसी तड़प से तो सांसें चलती हैं,
मिल जाने पर तो बस ख़ामोशी छा जाती है,
फिर वह बेचैन कर देने वाली चाहत कहाँ रहती है।

ख़्वाबों में तेरा आना और आकर चले जाना,
वह एक पल की मुलाक़ात के लिए हफ्तों तरसना,
अगर रोज़ का मिलना मुकम्मल हो जाए,
तो उस एक पल के दीदार की शिद्दत कहाँ रहती है।

फासले ही तो इस आग को हवा देते हैं,
दूर रहकर भी हम एक-दूसरे को दुआ देते हैं,
पास आकर जब आदत बन जाते हैं लोग,
तो वो इबादत जैसी पाकीज़ा उल्फ़त कहाँ रहती है।

वो ख़तों में छिपे लफ़्ज़ों का इंतज़ार करना,
तेरी आवाज़ सुनने को हर लम्हा बेकरार रहना,
जब हर वक्त तुम पास ही रहोगे मेरे,
तो मिलने की वो बेहिसाब फुर्सत कहाँ रहती है।

अधूरे पन्नों पर ही तो सबसे हसीन नज़्म लिखी जाती है,
अधूरी गुफ़्तगू ही तो उम्र भर ज़हन में दोहराई जाती है,
जो मुकम्मल हो जाए किताब ज़िंदगी की,
तो फिर उसे दोबारा पढ़ने की हसरत कहाँ रहती है।

कच्ची उम्र का वो एक अधूरा सा वादा,
जिसमें चाहत कम न थी, पर दर्द था ज़्यादा,
वही दर्द तो शायर बनाता है ज़माने को,
वरना सुकून में वो शायरी की लज्ज़त कहाँ रहती है।

हासिल हो जाने पर हर चीज़ आम हो जाती है,
इश्क़ की वो शाही सल्तनत गुलाम हो जाती है,
ताज़गी जो रहती है महज़ एक अनकहे अहसास में,
वो रस्मों के बाज़ारों में फ़िर बिका करती है।

चलो अच्छा है कि हम पूरे न हो सके,
एक-दूसरे के होकर भी पूरी तरह खो न सके,
यह जो अधूरी कसक है, यही हमारी दौलत है,
वरना मुकम्मल होने पर इश्क़ में ये बरकत कहाँ रहती है।

मोहब्बत अधूरी ही ठीक लगती है,
मुक़्क़मल हो जाने पर मोहब्बत कहाँ रहती है।

कुंदन राज दत्ता “निश्छल”

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Author

Muktika Sahityakar