तुम, मैं और वो ढलती शाम
क्षितिज पर सूरज की लाली है छाई,
एक खामोश सी मदहोशी है छाई।
दूर तलक बस खामोश नजारा है,
हाथों में हाथ, बस तेरा सहारा है।
वो ढलती शाम और यादें तुम्हारी,
जैसे कोई अधूरी सी कहानी हमारी।
आसमां ने ओढ़ ली है केसरिया चादर,
तुम पास हो तो थम सा गया है मंजर।
हवाओं में घुली है एक मीठी सी सरसराहट,
सुनाई दे रही है तेरे दिल की आहट।
पहाड़ों की ओट में छिपता वो सूरज,
पूछ रहा है हमसे मोहब्बत की गरज।
न शब्द हैं लबों पर, न कोई शिकायत है,
तेरी मौजूदगी ही जैसे खुदा की इनायत है।
अंधेरा धीरे-धीरे उजालों को निगल रहा,
पर तेरे प्यार का दिया मेरे दिल में जल रहा।
ये लम्हा जैसे सदियों को समेटे हुए है,
तेरी बाहों में सुकून के पल लेटे हुए हैं।
वक्त की रफ्तार को आज रोक लेने दो,
इस ढलती शाम को जी भर के देख लेने दो।
आंखों में डूबा है ये नीला सा आसमां,
जैसे हम दोनों का ही हो ये सारा जहां।
ये रंग बदलते बादल, ये गहराता सन्नाटा,
जैसे रूह ने रूह से कोई रिश्ता है बांटा।
चलो खो जाएं इस शाम की गहराई में,
मिले सुकून आज इस तन्हाई में।
न कल की फिक्र, न कल का कोई डर,
बस तुम साथ रहो उम्र भर का हमसफर।
दिन ढल गया पर उम्मीद बाकी है,
तेरा एक दीदार ही मेरे जीने को काफी है।
इस ढलती शाम का हर पल अनमोल है,
तेरी मुस्कुराहट का भला क्या मोल है?
सितारे अब पलकें बिछाने लगे हैं,
हमें अपनी दुनिया में बुलाने लगे हैं।
पर ये शाम तो बस हमारे नाम रहेगी,
यादों के रजिस्टर में ये खास शाम रहेगी।
तुम हो, मैं हूँ और ये हसीन मंजर है,
प्यार का ये एहसास सबसे सुन्दर है।
यूँ ही ढलती रहे शामें तेरे साथ हर दफा,
कभी न हो हम एक-दूजे से जुदा या खफा।
कुंदन राज दत्ता “निश्छल”
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