
एक चिट्ठी जो कभी भेजी नहीं गई
प्रिय…,
आज जब बरसों पुरानी अपनी किताबों की अलमारी को साफ कर रही थी, तो पन्नों के बीच दबा हुआ एक मोड़ा हुआ पन्ना मिला। यह वही खत है जिसे मैंने सालों पहले तुम्हारे नाम लिखा था, पर कभी डाकिया इसे तुम्हारे पते तक पहुँचा न सका। इसे भेजने की हिम्मत मैं कभी जुटा ही नहीं पाई, क्योंकि कुछ बातें कह देने से ज़्यादा, मन के किसी चुपचाप कोने में संभाल कर रखने के लिए ही बनी होती हैं।
इस खत में न तो कोई शिकायत है और न ही बीती बातों का मलाल। इसमें बस कुछ अनकहे एहसास हैं जो समय की धूल के नीचे दब गए थे। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ गई, तुम अपनी राह चले गए और मैं अपनी राह। फिर भी, कभी-कभी जब शाम ढलती है, तो दिल के किसी कोने में यह सवाल ज़रूर उठता है कि क्या तुमने भी कभी कुछ ऐसा लिखा था जो मुझ तक पहुँच न सका?
यह चिट्ठी शायद अब भी यहीं, मेरे पास ही रहेगी—एक ख़ामोश गवाह बनकर कि कभी किसी मोड़ पर हमारी कहानियाँ भी एक-दूसरे से गुज़री थीं।
लेखिका रेखा तोमर
तारीख: 16 अक्टूबर 2026
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Agar Rekha Tomar ki is rachna ne aapke hriday ko chhua ho, toh unki kalam aur sahityik prayas ko aage badhane hetu ek chhota sa sneha-sammaan bhent karein:








