विश्वासघात

दिल पे अपनों का ही अबकी बार गहरा वार हुआ,

काँच सा नाज़ुक भरोसा आज तार-तार हुआ।

जिसको माना था सदा ही हमने अपनी ज़िंदगी,

आज उसी के हाथों से ही ये विश्वासघात हुआ।

गैरों के छलावे का तो कोई मलाल ही न था,

हमको तो अपनों की ही नीयत से मलाल हुआ।

हर हँसी के पीछे छुपा था ज़हर छल – फ़रेब का,

मासूमियत का ये मज़ाक सरे बाज़ार हुआ।

जिस दरख़्त के साए में हमने राहत ढूंढी थी,

उसकी ही हर शाख से अब नफ़रतों का वार हुआ।

सच कहा है किसी ने कि धोखा पराए कहां देते,

जानने वालों से ही दिल का सौदा हर बार हुआ।

आँख मूँदकर जो किया था एतबार हमने कभी,

आज उसी एतबार का ही कत्ल ज़ार-ज़ार हुआ।

ज़िंदगी ने एक कड़वा ये सबक सिखा दिया,

जहां में सीधे पन का ही सबसे बड़ा नुकसान हुआ।

अब न करेंगे किसी के झूठे वादों पर यकीं,

ज़ख्म खाने के बाद ही तो दिल ये होशियार हुआ।

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जिसपे हद से ज़्यादा यकीं किया, उसी ने ये घाव दिया है,

काँच से नाज़ुक भरोसे को अपनों ने ही तोड़ दिया है।

गैरों की बातों में तो कभी वो ज़हर था ही नहीं,

ज़िंदगी ने धोखा भी हमें अपनों के हाथों दिला दिया है।

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— लेखिका रेखा तोमर मैहर

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