एक ना एक दिन
एक ना एक दिन यह बदली छँट जाएगी,
धुंधली सी यह रात भी थम जाएगी।
जो अश्क आँखों में आज ठहरे हैं,
उनमें खुशियों की नई धूप मुस्कुराएगी।
वक्त के इस कठिन इम्तिहान का,
एक ना एक दिन कोई सिला आएगा।
टूटे हुए इन सपनों के मलबे से,
फिर उम्मीदों का एक नया महल मुस्कुराएगा।
जो फासले आज दिलों को सताते हैं,
एक ना एक दिन वो भी सिमट जाएंगे।
बिछड़े हुए वो अजीज चेहरे सारे,
गले लगकर फिर से सुकून पाएंगे।
सब्र की इस डोरी को थामे रखना,
एक ना एक दिन नया सवेरा आएगा।
बदलेगा यह गर्दिश का दौर भी,
जब तू खुद अपनी तकदीर बनाएगा।
कुंदन राज दत्ता “निश्छल”
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